नरेश ने मिलाया बेनीवाल से हाथ, गुंजल भी होंगे शामिल? राजस्थान में नए 'पावर सेंटर' की आहट
राजस्थान की राजनीति में नरेश मीणा, हनुमान बेनीवाल और प्रहलाद गुंजल के नामों को लेकर नए सियासी समीकरण की चर्चा तेज है। जानें मुलाकात और संभावित Issue-Based Unity के मायने।
राजस्थान की राजनीति में कई बार सबसे महत्वपूर्ण कहानी वह नहीं होती जो मंच से सुनाई देती है, बल्कि वह होती है जो मुलाकातों, समर्थन और राजनीतिक संकेतों के बीच बन रही होती है। इस वक्त तीन नामों को लेकर ऐसा ही सवाल खड़ा हो रहा है। नरेश मीणा, हनुमान बेनीवाल और प्रहलाद गुंजल। नरेश मीणा के परिवार और समर्थकों की हनुमान बेनीवाल से मुलाकात ने नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा को हवा दी है। दूसरी तरफ प्रहलाद गुंजल पहले नरेश मीणा की रिहाई के लिए सक्रिय रह चुके हैं और हाल में भी जेल में बंद आदिवासी नेताओं की रिहाई के लिए रास्ता निकालने की बात कह चुके हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये केवल अलग-अलग राजनीतिक घटनाएं हैं या भविष्य में किसी एक मुद्दे पर तीन राजनीतिक धाराओं के करीब आने की संभावना बन रही है? हालांकि अभी नरेश मीणा और हनुमान बेनीवाल के बीच किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है। इसी तरह प्रहलाद गुंजल के ऐसे किसी संभावित फ्रंट में शामिल होने की भी कोई घोषणा नहीं है। इसलिए इसे फिलहाल गठबंधन नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक समीकरण के तौर पर ही देखना उचित होगा।
नरेश के परिवार-समर्थकों की बेनीवाल से मुलाकात क्यों महत्वपूर्ण?
हनुमान बेनीवाल की राजनीति राजस्थान में लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस से अलग तीसरी राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश करती रही है। आगामी पंचायत और निकाय चुनाव RLP के लिए इसी जमीन को जांचने का महत्वपूर्ण मौका हो सकते हैं। इसी बीच नरेश मीणा के परिवार और समर्थकों का बेनीवाल से संपर्क राजनीतिक रूप से दिलचस्प हो जाता है। इस मुलाकात को सीधे गठबंधन से जोड़ना जल्दबाजी होगी, लेकिन इससे इतना संकेत जरूर मिलता है कि नरेश से जुड़े लोग अलग-अलग प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों तक अपना मुद्दा पहुंचा रहे हैं।
फिर प्रहलाद गुंजल की एंट्री कहां से?
इस संभावित समीकरण में प्रहलाद गुंजल का नाम नरेश मीणा के कारण जुड़ता है। गुंजल नरेश की रिहाई के लिए पहले सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। हाल में आदिवासी दिवस पर दिए बयान में उन्होंने जेल में बंद आदिवासी नेताओं की रिहाई का रास्ता निकालने की बात भी कही थी। इसलिए भविष्य में नरेश मीणा की रिहाई को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन खड़ा होता है तो गुंजल की भूमिका पर नजर रहना स्वाभाविक है। और अगर उसी मुद्दे पर हनुमान बेनीवाल भी खुलकर सामने आते हैं तो तीनों नाम पहली बार एक साझा राजनीतिक मुद्दे के आसपास दिखाई दे सकते हैं।
तीन चेहरे साथ आए तो किसकी बढ़ेगी मुश्किल?
यह समीकरण दिलचस्प इसलिए होगा क्योंकि तीनों की राजनीतिक पहचान एक जैसी नहीं है। हनुमान बेनीवाल के पास अपनी पार्टी RLP और स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान है। प्रहलाद गुंजल कांग्रेस में हैं और हाड़ौती क्षेत्र में उनका अपना राजनीतिक प्रभाव रहा है। नरेश मीणा की राजनीति आंदोलनों और समर्थकों की लामबंदी से चर्चा में रही है। इसलिए तीनों का औपचारिक गठबंधन फिलहाल कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन किसी मुद्दे पर इनका साथ आना अलग बात है। राजनीति में स्थायी गठबंधन से पहले Issue-Based Unity भी महत्वपूर्ण होती है।
नरेश बन सकते हैं कॉमन लिंक?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक सवाल है। गुंजल का नरेश से पुराना राजनीतिक जुड़ाव और समर्थन रहा है। अब नरेश से जुड़े लोगों का बेनीवाल से संपर्क सामने आया है। ऐसे में नरेश मीणा का मुद्दा दो अलग राजनीतिक धाराओं के बीच कॉमन लिंक बनने की क्षमता रखता है। लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा तभी होगी जब किसी बड़े आंदोलन, चुनाव या राजनीतिक फैसले के समय ये नेता एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दें।
निकाय-पंचायत चुनाव होंगे पहला टेस्ट
राजस्थान में आने वाले स्थानीय चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस की लोकप्रियता का टेस्ट नहीं होंगे। ये क्षेत्रीय नेताओं की जमीनी ताकत भी बताएंगे। हनुमान बेनीवाल के लिए यह देखने का अवसर होगा कि RLP विधानसभा चुनावों के बीच के समय में अपना संगठन कितना विस्तार कर पाई है। नरेश मीणा से जुड़े राजनीतिक प्रभाव की भी अलग-अलग क्षेत्रों में परीक्षा हो सकती है। वहीं भाजपा और कांग्रेस दोनों की कोशिश क्षेत्रीय नेताओं के कारण अपने वोट बैंक में होने वाली सेंध को रोकने की होगी।
दूसरी तरफ पायलट का अलग गेम
इस पूरी सियासी हलचल के बीच सचिन पायलट की राजनीति भी गौर करने लायक है।
कांग्रेस के आंतरिक विवादों में हर समय दिखाई देने के बजाय पायलट चुनिंदा सार्वजनिक मुद्दों पर सरकार को घेरते नजर आ रहे हैं। हाल में सरकारी स्कूलों की स्थिति और मीडिया कवरेज से जुड़े निर्देशों पर उन्होंने भजनलाल सरकार पर तीखा हमला किया। ऐसे में पायलट को पूरी तरह 'खामोश' कहना सही नहीं होगा। ज्यादा सटीक यह है कि उनकी सक्रियता फिलहाल Selective और Issue-Based दिखाई देती है।
किरोड़ी की रणनीति पर भी नजर
किरोड़ी लाल मीणा का नाम भी इस राजनीतिक तस्वीर से अलग नहीं किया जा सकता।
आंदोलनकारी नेता की उनकी पुरानी पहचान के कारण युवाओं, भर्ती परीक्षाओं और सामाजिक मुद्दों पर उनकी हर राजनीतिक गतिविधि पर नजर रहती है। अब विधानसभा सत्र और स्थानीय चुनावों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि किरोड़ी सरकार के मंत्री के रूप में अपनी भूमिका को आगे रखते हैं या किसी जनमुद्दे पर फिर पुराने आंदोलनकारी अंदाज में दिखाई देते हैं।
भजनलाल के सामने मल्टी-फ्रंट चुनौती
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार निकाय और पंचायत चुनाव से पहले अपनी योजनाओं, भर्तियों, नियुक्तियों और विकास कार्यों को जनता तक पहुंचाने में लगी है। भाजपा संगठन भी वार्ड और बूथ स्तर पर चुनावी तैयारियां तेज कर रहा है। लेकिन सरकार की चुनौती सिर्फ कांग्रेस नहीं है। राजस्थान के जिन क्षेत्रों में क्षेत्रीय नेताओं का मजबूत प्रभाव है, वहां मुकाबला स्थानीय समीकरणों के आधार पर बदल सकता है। इसलिए बेनीवाल जैसे नेताओं की बढ़ती सक्रियता और नरेश मीणा जैसे आंदोलन से निकले चेहरे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
'नरेश + बेनीवाल + गुंजल' हकीकत या सिर्फ सियासी संभावना?
फिलहाल इसका जवाब साफ है। कोई औपचारिक गठबंधन सामने नहीं आया है। लेकिन राजनीति में अगला समीकरण समझने के लिए केवल घोषणाओं का इंतजार भी नहीं किया जाता। कौन किससे मिल रहा है, कौन किसके मुद्दे का समर्थन कर रहा है और कौन किस आंदोलन में साथ खड़ा हो रहा है। इन संकेतों से भविष्य की दिशा का अंदाजा लगाया जाता है। नरेश मीणा से जुड़े लोगों की बेनीवाल से मुलाकात और गुंजल का नरेश की रिहाई को लेकर सामने आना फिलहाल ऐसी ही दो अलग घटनाएं हैं। अगर आने वाले दिनों में ये राजनीतिक लकीरें किसी एक मुद्दे पर मिलती हैं तो राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस से इतर एक दिलचस्प Issue-Based Power Centre उभर सकता है। और तब निकाय-पंचायत चुनाव केवल स्थानीय सत्ता की लड़ाई नहीं रहेंगे। वे यह भी बताएंगे कि 2028 की बड़ी लड़ाई से पहले राजस्थान में तीसरी राजनीतिक जमीन पर आखिर किसका कब्जा होने वाला है।

