राजस्थान में 31 जुलाई तक होंगे पंचायत-निकाय चुनाव?, हाईकोर्ट की अंतिम मुहर
राजस्थान में सरपंची की तैयारी कर रहे प्रत्याशियों के लिए गुड न्यूज है. हाईकोर्ट ने एक बार फिर सरकार को सख्त निर्देशों में कहा कि चुनाव की तारीख हर हाल में 31 जुलाई 2026 ही रहेगी। ग्रामीण और शहरी सियासी गलियारों में पिछले एक साल से जिस सबसे बड़े चुनावी सस्पेंस ने हर राजनीतिक दल और जमीनी कार्यकर्ताओं की सांसें अटका रखी थीं, उस पर आज राजस्थान हाई कोर्ट ने पूरी तरह से अंतिम कानूनी मुहर लगा दी है। राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश में समय पर पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव नहीं कराए जाने के खिलाफ दायर की गई अवमानना याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने इस पूरे मामले की विस्तृत कानूनी समीक्षा करने के बाद याचिकाकर्ताओं की अवमानना याचिकाओं को पूरी तरह से सारहीन घोषित करते हुए खारिज कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को आगामी 31 जुलाई 2026 तक हर हाल में चुनावी प्रक्रिया को पूरा करना ही होगा। इस फैसले के बाद जहां एक तरफ सरकार को अवमानना की कार्रवाई से बड़ी राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ 31 जुलाई की सख्त टाइमलाइन ने प्रशासनिक अमले को पूरी तरह से इलेक्शन मोड में ला खड़ा किया है।

सरकार पर अवमानना का खतरा?
पिछले साल नवंबर 2025 में राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रदेश की करीब 439 जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए भजनलाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को एक कड़ा निर्देश जारी किया था। उस आदेश के तहत सरकार को 31 दिसंबर 2025 तक वार्डों का परिसीमन और सीमांकन पूरा करना था और किसी भी सूरत में 15 अप्रैल 2026 से पहले चुनाव संपन्न कराने थे।

लेकिन जब 15 अप्रैल 2026 की समय सीमा बीत गई और धरातल पर चुनाव नहीं हो सके, तो विपक्ष और याचिकाकर्ताओं ने इसे न्यायपालिका के आदेश की जानबूझकर की गई अवहेलना माना। इसी को आधार बनाकर कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की गुहार लगाई थी, जिस पर पिछले महीने हाई कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था।
बदल गया कानूनी समीकरण
आज जब इस बेहद संवेदनशील मामले पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत का माहौल पूरी तरह से कानूनी तर्कों से गरमा गया। राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए खुद राजस्थान के महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद कोर्ट रूम में मौजूद थे।
महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने राज्य सरकार का मजबूत पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि सरकार की मंशा चुनाव टालने की कतई नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक मजबूरियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट में हो रही देरी के कारण 15 अप्रैल तक चुनाव कराना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो सका था। सरकार की ओर से कोर्ट में एक विशेष प्रार्थना पत्र भी पेश किया गया था, जिसमें चुनावी डेडलाइन को आगे बढ़ाने की मांग की गई थी।
अदालत ने सरकार की दलीलों और बदले हुए घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए पाया कि चूंकि कोर्ट पहले ही अपनी मुख्य रिट याचिका में चुनाव कराने की नई अंतिम तारीख 31 जुलाई 2026 तय कर चुका है, इसलिए अब पुरानी डेडलाइन (15 अप्रैल) को लेकर दायर की गई अवमानना याचिकाओं का कोई कानूनी औचित्य नहीं रह जाता है। इसी आधार पर खंडपीठ ने एडवोकेट प्रेमचंद देवंदा और पुनीत सिंघवी की दलीलों को दरकिनार करते हुए दोनों अवमानना याचिकाओं को पूरी तरह से निस्तारित और समाप्त कर दिया।
JP Sharma 
