दूरी की तस्वीर या राजनीति का संदेश? भजनलाल-वसुंधरा समीकरण पर उठते सवाल !
राज्यसभा के नामांकन के दौरान की एक तस्वीर ने बीजेपी की राजनीति में अंदरखाने चल रही खटास को साफ कर दिया है।
राजनीत में तस्वीरें अक्सर हजार शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। राजस्थान भाजपा की राजनीति में इन दिनों एक तस्वीर चर्चा में बनी हुई है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने वाले सतीश पूनिया के साथ अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, लेकिन उसी कार्यक्रम की एक दूसरी तस्वीर, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी मौजूद थीं, पोस्ट का हिस्सा नहीं बनी। बस फिर क्या था, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
राजनीति में कई बार जो दिखता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वो होता है जो नहीं दिखता। और भाजपा की राजस्थान इकाई में इन दिनों यही सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर वसुंधरा राजे को तस्वीर से दूर रखने का फैसला महज संयोग था या फिर कोई राजनीतिक संदेश?

सियासत को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वसुंधरा राजे कभी भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हुआ करती थीं। दो बार मुख्यमंत्री रहीं, संगठन और सत्ता दोनों पर मजबूत पकड़ रही। लेकिन समय बदला, नेतृत्व बदला और अब भाजपा का चेहरा भजनलाल शर्मा हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन भी बदलता दिखाई दे रहा है।
सियासत में चर्चा
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा नई नहीं है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से भजनलाल शर्मा और वसुंधरा राजे के बीच सार्वजनिक तौर पर वह गर्मजोशी नजर नहीं आई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। हालांकि दोनों नेता पार्टी मंचों पर एक-दूसरे के प्रति सम्मान जताते रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के नए नेतृत्व और पुराने कद के बीच एक स्वाभाविक दूरी महसूस की जा सकती है।

अब बात उस तस्वीर की। सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर में सतीश पूनिया और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा दिखाई देते हैं। लेकिन कार्यक्रम की दूसरी तस्वीर में वसुंधरा राजे भी मौजूद थीं। राजनीतिक विरोधियों को इससे एक नया मुद्दा मिल गया। कुछ लोगों ने इसे "फोटो क्रॉप की राजनीति" बताया, तो कुछ ने इसे भाजपा के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों का प्रतीक माना।
व्यंग्यकारों ने भी मौका नहीं छोड़ा। एक टिप्पणी आई—"राजनीति में कभी-कभी नेताओं से ज्यादा उनकी तस्वीरों का भविष्य तय किया जाता है।" दूसरी तरफ कुछ लोगों ने चुटकी लेते हुए कहा कि शायद सोशल मीडिया टीम को भी अब यह समझ आ गया है कि राजस्थान भाजपा में कौन 'करंट' है और कौन 'करंट अफेयर्स'।

अटकलों को बताया बेबुनियाद:
हालांकि भाजपा के नेता इन अटकलों को बेबुनियाद बताते हैं। उनका कहना है कि किसी पोस्ट में कौन-सी तस्वीर लगाई जाए, यह पूरी तरह तकनीकी और प्रचार रणनीति का विषय होता है। लेकिन राजनीति में प्रतीकों का महत्व इतना अधिक होता है कि एक तस्वीर का चयन भी बड़े संदेश के रूप में देखा जाने लगता है। सवाल यह नहीं है कि तस्वीर में कौन था और कौन नहीं। असली सवाल यह है कि क्या राजस्थान भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन के बाद वसुंधरा राजे का प्रभाव सीमित हुआ है, या फिर यह सिर्फ राजनीतिक विश्लेषकों की कल्पना है? इसका जवाब शायद आने वाले समय में पार्टी के कार्यक्रमों, मंचों और तस्वीरों में ही दिखाई देगा।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि राजस्थान की राजनीति में तस्वीरें अब सिर्फ यादें नहीं, बल्कि संदेश भी बन चुकी हैं। और जब राजनीति तस्वीरों से चलने लगे, तो एक फोटो का गायब होना भी खबर बन जाता है।
देश-दुनिया की हर अपडेट खबरें सिर्फ यहां मिलेगी। PK टाइम्स पर हर पल की जानकारी सबसे पहले, क्योंकि हमारी टीम रहती है हर पल तैयार। जुड़े रहें हमारे साथ और बने रहिए अपडेट। प्ले स्टोर से PKTIMES एप भी डाउनलोड कर आप देख सकते हैं तमाम खबरें।।

