सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बढ़ी बेचैनी, दुनिया के सामने उठा रहा पानी का मुद्दा

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद बढ़ा है। जानिए 1960 की संधि, पहलगाम हमले के बाद भारत के फैसले और पाकिस्तान की जल चिंता की पूरी कहानी।

सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बढ़ी बेचैनी, दुनिया के सामने उठा रहा पानी का मुद्दा

भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव का असर अब सिंधु जल संधि पर भी दिखाई दे रहा है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को एबेयंस यानी अगली समीक्षा तक निष्क्रिय स्थिति में रखने का फैसला किया था। भारत ने अपने इस कदम को सुरक्षा परिस्थितियों से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि आतंकवाद और सामान्य सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।

भारत के इस फैसले के बाद पाकिस्तान लगातार अपनी जल सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर कर रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि उसकी कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। ऐसे में संधि से जुड़े तंत्र के प्रभावित होने को लेकर इस्लामाबाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना पक्ष रख रहा है।

1960 में हुई थी सिंधु जल संधि

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि का उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली के पानी के इस्तेमाल और दोनों देशों के अधिकारों को निर्धारित करना था।

संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियों के तौर पर भारत के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के पानी पर पाकिस्तान के लिए व्यापक अधिकार तय किए गए। हालांकि, पश्चिमी नदियों पर भारत को भी निर्धारित शर्तों के तहत घरेलू उपयोग, कृषि और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पानी इस्तेमाल करने की अनुमति है।

पहलगाम हमले के बाद बदले हालात

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को एबेयंस में रखने का फैसला किया। भारत का तर्क है कि आतंकवाद के माहौल में दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग और संधि से जुड़ी प्रक्रियाओं को पहले की तरह जारी रखना संभव नहीं है।

भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि आतंकवाद और बातचीत को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। इसी नीति के तहत सिंधु जल संधि को लेकर भी भारत ने अपना रुख सख्त किया है।

पाकिस्तान को क्यों सता रही पानी की चिंता?

पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली बेहद महत्वपूर्ण है। देश के बड़े कृषि क्षेत्र की सिंचाई इसी नदी तंत्र से जुड़े पानी पर निर्भर करती है। यही वजह है कि भारत के फैसले को लेकर पाकिस्तान में जल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

पाकिस्तान का आरोप है कि भारत पानी के मुद्दे को रणनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। वहीं भारत अपने फैसले को आतंकवाद के खिलाफ उठाए गए कदम के तौर पर देखता है।

पहले भी होते रहे हैं जल विवाद

सिंधु जल संधि के बावजूद दोनों देशों के बीच कई बार जलविद्युत परियोजनाओं और नदी के पानी के इस्तेमाल को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। दोनों पक्षों ने अलग-अलग मौकों पर संधि की अपनी-अपनी व्याख्या रखी है।

अब पहलगाम हमले के बाद संधि को एबेयंस में रखने से पानी का मुद्दा भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक और संवेदनशील विषय बन गया है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की गुहार

भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान अपनी जल सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठा रहा है। पाकिस्तान की कोशिश है कि सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े अपने हितों और चिंताओं को वैश्विक मंचों पर सामने रखा जाए।

वहीं भारत लगातार यह कह रहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा प्राथमिक है।

अब आगे क्या?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच आगे क्या रास्ता निकलता है। एक तरफ पाकिस्तान पानी को अपनी कृषि और आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय समर्थन तलाश रहा है, वहीं भारत अपने फैसले को आतंकवाद के खिलाफ अपनी व्यापक नीति का हिस्सा बता रहा है।

आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों में सुधार या तनाव की दिशा ही यह तय करेगी कि सिंधु जल संधि को लेकर मौजूदा गतिरोध किस तरह आगे बढ़ता है।