सरकारी स्कूलों में कैमरा बंद? UP-Rajasthan के सर्कुलर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, PIL में रद्द करने की मांग
Supreme Court में UP और Rajasthan के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और बिना अनुमति फोटो-वीडियोग्राफी पर रोक के खिलाफ PIL दाखिल हुई है। जानें पूरा मामला।
उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और बिना अनुमति फोटो-वीडियोग्राफी पर रोक लगाने वाले सरकारी आदेश अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। दोनों राज्यों में लागू किए गए इन प्रतिबंधों को लेकर वकील नरेंद्र मिश्रा ने जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिका में संबंधित सर्कुलर को तत्काल रद्द करने की मांग की गई है।
याचिका में सवाल उठाया गया है कि स्कूल परिसरों में प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू और लाइव-स्ट्रीमिंग पर इस तरह की व्यापक पाबंदी क्या संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के अनुरूप है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन नियमों से पत्रकारों, सामाजिक संगठनों, डिजिटल मीडिया से जुड़े लोगों और अन्य नागरिकों के लिए सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाना मुश्किल हो सकता है।
किन संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया गया?
PIL में इन सरकारी आदेशों को संविधान के कई प्रावधानों के खिलाफ बताया गया है। याचिका में अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत पेशे की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है।
इसके अलावा अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार तथा अनुच्छेद 21-A में शिक्षा के अधिकार को भी याचिका में आधार बनाया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी के लिए मीडिया तथा नागरिक समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर व्यापक प्रतिबंध लगाने से जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
आखिर क्या कहते हैं राजस्थान और UP के आदेश?
विवाद की जड़ में दोनों राज्यों के शिक्षा विभागों की ओर से जारी वे निर्देश हैं, जिनमें स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को नियंत्रित किया गया है।
इन नियमों के अनुसार, बिना संस्था प्रधान या सक्षम अधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति के बाहरी व्यक्ति स्कूल परिसर में प्रवेश नहीं कर सकता। स्कूल में आने वाले लोगों को अपनी जानकारी विजिटर रजिस्टर में दर्ज करनी होगी।
इसके साथ ही छात्रों, शिक्षकों और स्कूल की गतिविधियों की फोटो लेने, वीडियो बनाने, ऑडियो रिकॉर्ड करने या लाइव-स्ट्रीमिंग करने को लेकर भी अनुमति की शर्त लागू की गई है।
यानी अब कोई बाहरी व्यक्ति सिर्फ स्कूल पहुंचकर वहां की गतिविधियों को रिकॉर्ड नहीं कर सकता। इसके लिए संबंधित स्तर से अनुमति लेना जरूरी होगा।
सरकार की दलील- बच्चों की सुरक्षा सबसे अहम
सरकारों की ओर से ऐसे नियमों के पीछे बच्चों की सुरक्षा और निजता को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। स्कूल परिसरों में अनधिकृत लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण रखने से छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
सरकारों का यह भी तर्क है कि बच्चों की तस्वीरें या वीडियो बिना अनुमति सोशल मीडिया पर प्रसारित होने से उनकी निजता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा बाहरी लोगों की अनियंत्रित गतिविधियों से स्कूल के शैक्षणिक माहौल में भी व्यवधान पैदा होने की आशंका रहती है।
इसी वजह से प्रवेश और रिकॉर्डिंग के लिए अनुमति की व्यवस्था को सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
विरोधियों का सवाल- फिर स्कूलों की बदहाली सामने कैसे आएगी?
दूसरी ओर, इन प्रतिबंधों को लेकर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार की नीतियों की निगरानी करने वाले लोगों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी, शौचालय, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं अक्सर तस्वीरों और वीडियो के जरिए ही सार्वजनिक होती हैं।
उनका तर्क है कि यदि स्कूल परिसर में कैमरा या रिकॉर्डिंग पर व्यापक रोक लगा दी जाती है, तो ऐसी समस्याओं को सामने लाना कठिन हो सकता है। कुछ सामाजिक संगठनों और विपक्षी नेताओं ने इसे सरकारी स्कूलों की स्थिति पर सार्वजनिक निगरानी को सीमित करने वाला कदम भी बताया है।
हालांकि, सरकारों का पक्ष बच्चों की सुरक्षा और निजता पर केंद्रित है, जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?
PIL दाखिल होने के बाद अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर रहेगी। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और निजता सुनिश्चित करने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या इन नियमों का असर नागरिकों तथा मीडिया के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ता है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में सरकारी स्कूलों से जुड़े लाखों छात्र, शिक्षक और अभिभावक सीधे तौर पर इससे प्रभावित हो सकते हैं।
फिलहाल याचिका में दोनों राज्यों के संबंधित आदेशों को रद्द करने की मांग की गई है। आगे सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अदालत की टिप्पणियों से यह स्पष्ट होगा कि स्कूलों में प्रवेश और रिकॉर्डिंग को लेकर लागू इन प्रतिबंधों पर न्यायिक रुख क्या रहता है।
बड़ा सवाल: सुरक्षा जरूरी या पारदर्शिता?
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और निजता से समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे कायम रहेगी।
अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL ने इसी संतुलन को कानूनी बहस के केंद्र में ला दिया है—क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए अनुमति व्यवस्था पर्याप्त है या फोटो-वीडियो पर व्यापक रोक जरूरी है? और क्या सरकारी स्कूलों की कमियों को सार्वजनिक करने का अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए? इन सवालों के जवाब अब अदालत की सुनवाई में तलाशे जाएंगे।

