थार के आसमान में गोडावण की पहली आजाद उड़ान: 3 महीने की ट्रेनिंग के बाद जंगल में छोड़े गए 2 पक्षी, GPS रखेगा नजर
जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में कैप्टिव-ब्रेड दो गोडावणों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया। जानें री-वाइल्डिंग प्रोजेक्ट और GPS निगरानी की पूरी जानकारी।
थार के रेगिस्तान से राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण के संरक्षण को लेकर बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। कैप्टिव ब्रीडिंग यानी नियंत्रित वातावरण में तैयार किए गए दो गोडावणों को पहली बार सीधे उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया। खुले आसमान में आजाद होते ही दोनों पक्षियों ने उड़ान भरी। यह कदम गोडावण संरक्षण की उस मुहिम का अहम हिस्सा है, जिसमें अब इन दुर्लभ पक्षियों को कृत्रिम वातावरण से निकालकर दोबारा जंगल में बसाने की कोशिश की जा रही है।
दोनों गोडावण करीब 7 महीने के हैं। इनकी लंबाई लगभग एक फीट और वजन करीब 5 किलो बताया गया है। इन्हें जैसलमेर के सम क्षेत्र स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क की सुदासरी रेंज में प्राकृतिक वातावरण के बीच छोड़ा गया।
इस मौके पर वन राज्य मंत्री संजय शर्मा, डीजी फॉरेस्ट संतोष तिवारी, भारतीय वन्यजीव संस्थान यानी WII के विशेषज्ञ और वन विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।
जंगल में छोड़ने से पहले 3 महीने की खास ट्रेनिंग
इन गोडावणों को सीधे जंगल में नहीं छोड़ा गया। पहले उन्हें करीब तीन महीने तक विशेष री-वाइल्डिंग टनल में रखा गया, जहां उन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवन जीने की ट्रेनिंग दी गई।
इस दौरान पक्षियों को खुद उड़ने, भोजन तलाशने और खुले वातावरण में सामान्य व्यवहार करने का अभ्यास कराया गया। विशेषज्ञों ने उनके स्वास्थ्य और व्यवहार की लगातार निगरानी की। जांच के बाद जब दोनों पक्षी प्राकृतिक वातावरण में रहने के लिए तैयार पाए गए, तब उन्हें जंगल में छोड़ने का फैसला किया गया।
अब GPS बताएगा कहां घूम रहे हैं गोडावण
जंगल में पहुंचने के बाद दोनों पक्षी वैज्ञानिकों की निगरानी से बाहर नहीं होंगे। इनके शरीर पर GPS टैग लगाए गए हैं। इन टैग की मदद से विशेषज्ञ उनकी लोकेशन और गतिविधियों पर नजर रख सकेंगे।
वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्राकृतिक वातावरण में पहुंचने के बाद गोडावण किस इलाके में जा रहे हैं, भोजन कैसे तलाश रहे हैं, कितनी दूरी तय कर रहे हैं और उनका व्यवहार किस तरह बदल रहा है।
इससे आने वाले समय में अन्य कैप्टिव-ब्रेड गोडावणों को जंगल में छोड़ने की रणनीति तैयार करने में भी मदद मिलेगी।
बिजली की हाईटेंशन लाइन से सबसे बड़ा खतरा
गोडावणों को प्राकृतिक आवास में वापस लाना जितना महत्वपूर्ण है, उनकी सुरक्षा उतनी ही बड़ी चुनौती है। बिजली की हाईटेंशन लाइनें इस पक्षी के लिए बड़ा खतरा मानी जाती हैं। इसके अलावा शिकारियों और अन्य खतरों से भी इनकी सुरक्षा करनी होगी।
GPS ट्रैकिंग के जरिए विशेषज्ञ इन पक्षियों की गतिविधियों पर नजर रखेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि वे किन क्षेत्रों में ज्यादा समय बिता रहे हैं। इससे उनके सुरक्षित आवास को लेकर भविष्य की योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।
9.25 करोड़ की लागत से तैयार हुई री-वाइल्डिंग टनल
गोडावणों को जंगल के लिए तैयार करने के उद्देश्य से रामदेवरा में करीब 9.25 करोड़ रुपए की लागत से विशेष री-वाइल्डिंग टनल तैयार की गई है।
करीब 160 मीटर लंबी और 64 मीटर चौड़ी इस टनल में रेगिस्तानी वातावरण जैसा माहौल तैयार किया गया। यहां पक्षियों को प्राकृतिक परिस्थितियों में धीरे-धीरे ढलने की ट्रेनिंग दी गई।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि गोडावण अचानक कैप्टिव वातावरण से खुले जंगल में जाने के बजाय धीरे-धीरे प्राकृतिक जीवन के लिए तैयार हो सकें।
2016 में शुरू हुई संरक्षण की मुहिम
गोडावण को बचाने के लिए वैज्ञानिक स्तर पर संरक्षण अभियान करीब एक दशक पहले शुरू हुआ था। वर्ष 2016 में इंटीग्रेटेड जीआईबी कंजर्वेशन प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई। इसके बाद 2019 में राजस्थान में बड़े स्तर पर गोडावण ब्रीडिंग प्रोग्राम आगे बढ़ाया गया।
जैसलमेर के सम में शुरुआती अस्थायी ब्रीडिंग सेंटर से काम शुरू हुआ। बाद में रामदेवरा में आधुनिक ब्रीडिंग सेंटर विकसित किया गया।
मार्च 2023 में इस सेंटर में कैप्टिव-ब्रेड पहला गोडावण चूजा पैदा हुआ। इसके बाद 2025 से गोडावणों को जंगल में लौटने के लिए री-वाइल्डिंग की ट्रेनिंग देने की प्रक्रिया शुरू हुई।
अब अगला लक्ष्य जंगल में गोडावणों की नई आबादी
गोडावणों को पहली बार प्राकृतिक आवास में छोड़ना सिर्फ दो पक्षियों की आजादी नहीं, बल्कि संरक्षण कार्यक्रम के अगले चरण की शुरुआत माना जा रहा है।
अगर ये दोनों गोडावण जंगल में सफलतापूर्वक सर्वाइव करते हैं और सामान्य तरीके से भोजन, उड़ान और आवास की गतिविधियां करते हैं, तो भविष्य में और कैप्टिव-ब्रेड गोडावणों को भी प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा सकता है।
थार के खुले आसमान में इन दो गोडावणों की उड़ान अब वैज्ञानिकों के लिए भी एक अहम प्रयोग है। इनके GPS से मिलने वाला डेटा बताएगा कि करीब एक दशक से चल रही संरक्षण की यह कोशिश अब जंगल में कितनी सफल हो रही है।

