11 हजार की नौकरी, रोज लाखों की ठगी का टारगेट: दिल्ली के फर्जी कॉल सेंटर से चलता था साइबर फ्रॉड नेटवर्क
डीग पुलिस ने दिल्ली के उत्तम नगर में चल रहे कथित फर्जी कॉल सेंटर का पर्दाफाश कर 64 लोगों को गिरफ्तार किया। आरोपी बैंक अधिकारी बनकर OTP, CVV और KYC डेटा हासिल करते थे, जबकि जांच में दो खातों से 4.9 करोड़ रुपये के लेनदेन के सुराग मिले हैं।
राजस्थान की डीग पुलिस ने साइबर ठगी के एक ऐसे अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा किया है, जो दिल्ली में बाकायदा कॉल सेंटर की तरह संचालित किया जा रहा था। पुलिस के मुताबिक यहां काम करने वाले युवक-युवतियों को 11 से 15 हजार रुपए तक मासिक वेतन दिया जाता था, लेकिन उनके सामने रोजाना लाखों रुपए की ठगी का लक्ष्य रखा जाता था।
पुलिस ने दिल्ली के उत्तम नगर में चल रहे कथित फर्जी कॉल सेंटर पर कार्रवाई करते हुए कुल 64 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें 31 युवक और 33 युवतियां शामिल हैं। मौके से बड़ी संख्या में मोबाइल फोन, बैंक अधिकारियों के नाम से तैयार फर्जी पहचान पत्र और ग्राहकों से जुड़ा संवेदनशील डेटा भी बरामद किया गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि यह नेटवर्क करीब तीन साल से सक्रिय था।
बैंक अधिकारी बनकर करते थे फोन, सामने रखी रहती थी पूरी स्क्रिप्ट
डीग पुलिस अधीक्षक शरण गोपीनाथ के अनुसार गिरोह ने अपने काम करने का तरीका किसी प्रोफेशनल कॉल सेंटर जैसा बना रखा था। यहां भर्ती किए गए युवाओं को सीधे लोगों से बातचीत करने के लिए नहीं छोड़ा जाता था, बल्कि उन्हें पहले प्रशिक्षण दिया जाता था।
कॉल के दौरान क्या बोलना है, ग्राहक का भरोसा कैसे जीतना है और बातचीत को धीरे-धीरे उसकी निजी बैंकिंग जानकारी तक कैसे पहुंचाना है, इसके लिए कर्मचारियों को पहले से तैयार लिखित स्क्रिप्ट उपलब्ध कराई जाती थी।
इसी स्क्रिप्ट के आधार पर कॉल करने वाले खुद को बैंक का अधिकारी या कर्मचारी बताते थे।
लोगों को अक्सर यह कहा जाता था कि उनके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाई जा रही है, कार्ड को रिन्यू करना है या बैंक की किसी सुविधा को अपडेट करना जरूरी है। ग्राहक को विश्वास दिलाने के लिए बैंक के नाम और लोगो से मिलती-जुलती कथित फर्जी वेबसाइट और पहचान पत्र भी दिखाए जाते थे।
बातचीत के दौरान हासिल करते थे OTP, CVV और KYC डिटेल
पुलिस जांच के अनुसार एक बार ग्राहक को भरोसा हो जाने के बाद उससे चरणबद्ध तरीके से संवेदनशील जानकारी मांगी जाती थी।
आरोपियों के निशाने पर OTP, CVV नंबर, PAN कार्ड से जुड़ी जानकारी, Gmail ID, जन्मतिथि और KYC से संबंधित अन्य विवरण रहते थे। पुलिस का कहना है कि जानकारी मिलने के बाद उसका इस्तेमाल ऑनलाइन धोखाधड़ी और रकम ट्रांसफर करने के लिए किया जाता था।
जॉब पोर्टल से ढूंढते थे बेरोजगार युवा
गिरोह सिर्फ लोगों को ठगने के लिए ही संगठित तरीके से काम नहीं करता था, बल्कि कर्मचारियों की भर्ती के लिए भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता था।
पुलिस के अनुसार जॉब पोर्टल पर नौकरी तलाश रहे युवाओं की जानकारी हासिल की जाती थी। इसके बाद उन्हें 11 से 15 हजार रुपए प्रतिमाह की नौकरी का ऑफर देकर कॉल सेंटर से जोड़ा जाता था।
ज्यादा लोगों को अपने जाल में फंसाने वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त कमीशन मिलने की बात भी जांच में सामने आई है। पुलिस के मुताबिक इस नेटवर्क में कुछ नाबालिगों को भी शामिल किया गया था।
उत्तम नगर की तीन मंजिला इमारत से चल रहा था सेटअप
डीग पुलिस ने जांच के बाद दिल्ली के उत्तम नगर स्थित एक तीन मंजिला इमारत पर दबिश दी थी। कार्रवाई के दौरान 88 एंड्रॉयड मोबाइल फोन जब्त किए गए।
इसके अलावा Axis Bank, HDFC Bank और Yes Bank के अधिकारियों के नाम से बनाए गए कथित फर्जी आईडी कार्ड भी पुलिस को मिले।
पुलिस को मौके से बड़ी मात्रा में ग्राहकों से संबंधित डेटा भी मिला है। इसमें लोगों के नाम, बैंक खाते, PAN कार्ड, पते और दूसरी बैंकिंग जानकारियां शामिल बताई जा रही हैं।
अब जांच का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित है कि इतनी बड़ी मात्रा में संवेदनशील डेटा आखिर गिरोह तक पहुंचा कैसे।
8 हजार रुपए में खरीदते थे 50 हजार लोगों का डेटा
पूछताछ के दौरान आरोपियों ने डेटा खरीदने को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी है।
पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने बताया कि वे करीब 8 हजार रुपए में लगभग 50 हजार लोगों का डेटा खरीद लेते थे। यह डेटा अलग-अलग प्लेटफॉर्म और स्रोतों के जरिए उन तक पहुंचता था।
पुलिस अब उन लोगों और नेटवर्क की पहचान करने में जुटी है, जो कथित रूप से बैंकिंग या व्यक्तिगत डेटा साइबर ठगी करने वालों तक पहुंचा रहे थे।
एक व्यक्ति के नाम पर कई सिम इस्तेमाल करने का भी आरोप
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह से जुड़े लोग एक ही व्यक्ति के नाम पर कई मोबाइल सिम कार्ड जारी करवाकर उनका इस्तेमाल करते थे।
इन नंबरों का उपयोग कथित तौर पर ग्राहकों को कॉल करने, अलग-अलग पहचान से संपर्क करने और डिजिटल फ्रॉड नेटवर्क को चलाने के लिए किया जाता था।
पुलिस अब यह भी जांच रही है कि इतनी बड़ी संख्या में सिम कार्ड जारी कराने में किसी दूसरे नेटवर्क या बिचौलियों की भूमिका तो नहीं थी।
करीब 50 बैंक खातों से रकम घुमाने का शक
साइबर ठगी से प्राप्त रकम को सीधे एक ही बैंक खाते में रखने के बजाय अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए जाने की जानकारी भी जांच में मिली है।
पुलिस के अनुसार करीब 50 बैंक खातों के इस्तेमाल की बात सामने आई है। इनमें से फिलहाल दो खातों से जुड़ी महत्वपूर्ण ट्रांजेक्शन डिटेल पुलिस के पास पहुंची है।
एक बैंक खाते में करीब 3.2 करोड़ रुपए और दूसरे खाते में लगभग 1.7 करोड़ रुपए के लेनदेन का पता चला है।
अन्य 48 खातों से जुड़ी विस्तृत जानकारी की जांच अभी जारी है।
शुरुआती जांच के आधार पर पुलिस को आशंका है कि पूरे नेटवर्क के जरिए की गई ठगी का आंकड़ा सैकड़ों करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। हालांकि वास्तविक रकम की पुष्टि सभी बैंक खातों, ट्रांजेक्शन और शिकायतों की जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी इस नेटवर्क से संबंधित कई शिकायतें मिलने की जानकारी सामने आई है।
Axis Bank के शाखा प्रबंधक की शिकायत से मिली अहम लीड
पूरे मामले की शुरुआत डीग स्थित Axis Bank शाखा के प्रबंधक फूल सिंह की शिकायत के बाद हुई।
बताया गया कि कुछ ग्राहक बैंक शाखा पहुंचकर शिकायत कर रहे थे कि उन्हें बैंक अधिकारी बनकर फोन किए जा रहे हैं। कॉल करने वाले लोगों ने अपनी कथित बैंक आईडी भी ग्राहकों को भेजी थी।
बैंक के स्तर पर जांच कराए जाने पर संबंधित पहचान पत्र फर्जी पाए गए।
इसके बाद शाखा प्रबंधक की ओर से साइबर क्राइम थाना डीग में अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई।
मोबाइल नंबर और फर्जी आईडी से पुलिस पहुंची मुख्य आरोपी तक
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने फर्जी बैंक आईडी और उनसे जुड़े मोबाइल नंबरों की तकनीकी जांच शुरू की।
इसी जांच के दौरान उत्तर प्रदेश निवासी आकाश पुत्र रामप्रकाश का नाम गिरोह से जुड़े प्रमुख सदस्यों में सामने आया।
जांच आगे बढ़ने पर पुलिस को दिल्ली के उत्तम नगर में संचालित कॉल सेंटर के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद टीम ने वहां कार्रवाई कर 64 लोगों को गिरफ्तार किया।
अब मुख्य संचालकों और डेटा सप्लायर पर फोकस
डीग पुलिस की जांच अभी समाप्त नहीं हुई है। अब पुलिस की प्राथमिकता इस नेटवर्क के उन लोगों तक पहुंचने की है, जो पर्दे के पीछे रहकर पूरे ऑपरेशन को नियंत्रित कर रहे थे।
जांच में विशेष रूप से डेटा उपलब्ध कराने वालों, बैंक खातों का इंतजाम करने वाले लोगों, सिम कार्ड नेटवर्क और ठगी की रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजने वाले लोगों की भूमिका खंगाली जा रही है।
पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि पिछले तीन वर्षों में इस नेटवर्क ने कितने लोगों को निशाना बनाया और ठगी की वास्तविक रकम कितनी है।

