पाकिस्तान में जिस शख्स पर था 2 लाख का इनाम, वह 55 साल बाद भारत में बना सरपंच; 1971 की जंग से जुड़ी है कहानी

पाकिस्तान के छाछरो से करीब 55 साल पहले भारत आए 77 वर्षीय पदम सिंह सोढ़ा अब बाड़मेर के छाछरो ग्राम पंचायत के पहले सरपंच चुने गए हैं।

पाकिस्तान में जिस शख्स पर था 2 लाख का इनाम, वह 55 साल बाद भारत में बना सरपंच; 1971 की जंग से जुड़ी है कहानी

राजस्थान के बाड़मेर में 77 वर्षीय पदम सिंह सोढ़ा छाछरो ग्राम पंचायत के पहले सरपंच चुने गए हैं। कभी पाकिस्तान में भारतीय सेना की मदद करने के आरोप में जासूसी का सामना करने वाले पदम सिंह ने अब उसी नाम के भारतीय गांव में चुनाव जीतकर इतिहास से जुड़ा एक नया अध्याय लिखा है।

 सरहद के उस पार छूटी पुश्तैनी हवेली, युद्ध के दौरान फहराया गया तिरंगा और वर्षों तक अपनी जन्मभूमि की यादों के साथ बिताया जीवन। यह कहानी है पदम सिंह सोढ़ा की, जिनका नाम 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ा हुआ है। करीब 55 साल पहले पाकिस्तान छोड़कर भारत आए पदम सिंह अब राजस्थान के बाड़मेर जिले में सरपंच बन गए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जिस छाछरो को छोड़कर उन्हें भारत आना पड़ा था, उसी नाम के गांव में आज उन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है। 77 साल की उम्र में मिली इस जीत ने उनके अतीत को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

338 वोटों से हासिल की जीत, बने गांव के पहले सरपंच

बाड़मेर की छाछरो (बावड़ी कला) ग्राम पंचायत में हुए चुनाव में पदम सिंह सोढ़ा ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी धना राम को 338 मतों से पराजित किया।

प्राप्त चुनावी विवरण के अनुसार, पदम सिंह को 950 वोट मिले, जबकि धना राम के पक्ष में 612 मत पड़े। इस जीत के साथ पदम सिंह नवगठित ग्राम पंचायत के पहले सरपंच बन गए।

उनकी जीत केवल एक स्थानीय चुनावी सफलता नहीं है। इसके पीछे भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद की सीमावर्ती परिस्थितियों, 1971 के युद्ध और एक परिवार के विस्थापन का लंबा इतिहास जुड़ा है।

 1971 में भारतीय सेना का साथ देने पर लगे थे जासूसी के आरोप

पदम सिंह सोढ़ा का परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित छाछरो से संबंध रखता है। 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा तो सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना की कार्रवाई के दौरान सोढ़ा परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रिपोर्टों के मुताबिक, पदम सिंह और उनके बड़े भाई लक्ष्मण सिंह सोढ़ा ने युद्ध के दौरान भारतीय सेना का सहयोग किया था। इसके बाद पाकिस्तान में दोनों भाइयों पर भारत के लिए जासूसी करने के आरोप लगाए गए।

बताया जाता है कि पाकिस्तानी प्रशासन ने दोनों भाइयों पर दो-दो लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया था।

इसी युद्ध से जुड़ी एक घटना के अनुसार, पदम सिंह ने पाकिस्तान के छाछरो स्थित अपनी पुश्तैनी हवेली पर भारत का तिरंगा फहराया था।

जब भारतीय सेना छाछरो तक पहुंची

दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान राजस्थान से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान चलाया था।

इस अभियान का नेतृत्व ब्रिगेडियर भवानी सिंह ने किया था। स्थानीय भूगोल और रेगिस्तानी रास्तों की जानकारी रखने वाले लोगों की सहायता भारतीय सैन्य कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।

बताया जाता है कि 6 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के साथ पाकिस्तान की ओर गए नागरिक सहयोगियों में पदम सिंह सोढ़ा भी शामिल थे।

भारतीय सेना ने इस अभियान के दौरान पाकिस्तान के छाछरो क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था। युद्ध के इस घटनाक्रम ने सोढ़ा परिवार की जिंदगी की दिशा बदल दी।

ब्रिगेडियर भवानी सिंह को 1971 के युद्ध में उनकी वीरता के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

 पाकिस्तान में छोड़नी पड़ी पुश्तैनी जमीन और हवेली

युद्ध के बाद पदम सिंह और उनके परिवार के सामने अपनी पुरानी जिंदगी छोड़ने की चुनौती आ गई।

परिवार पाकिस्तान के छाछरो में अपनी पुश्तैनी संपत्ति और हवेली छोड़कर भारत आ गया। शुरुआत में उन्होंने राजस्थान के चौहटन क्षेत्र में शरण ली और बाद में बाड़मेर के बावड़ी कला में बस गए।

उनके बड़े भाई लक्ष्मण सिंह सोढ़ा भी क्षेत्र के सार्वजनिक जीवन से जुड़े रहे और चौहटन के प्रधान बने।

हालांकि भारत में नया घर बस गया था, लेकिन पाकिस्तान के छाछरो से परिवार का भावनात्मक संबंध कभी समाप्त नहीं हुआ।

पदम सिंह अपने नाम के साथ छाछरो जोड़ते रहे। यह नाम उनके लिए केवल एक स्थान की पहचान नहीं, बल्कि अपने अतीत और जन्मभूमि की स्मृतियों का हिस्सा था।

जिस गांव को छोड़ा, उसी नाम के गांव में मिली नई पहचान

पदम सिंह की कहानी का सबसे अनोखा पहलू भारत में छाछरो नाम के नए गांव का अस्तित्व में आना है।

राजस्थान में राजस्व गांवों के पुनर्गठन की प्रक्रिया के दौरान करीब डेढ़ साल पहले बावड़ी कला क्षेत्र से अलग छाछरो नाम का नया राजस्व गांव बनाया गया।

इस नामकरण के पीछे पाकिस्तान के ऐतिहासिक छाछरो से जुड़ी स्थानीय विरासत और परिवारों की पुरानी पहचान को जीवित रखने की भावना बताई जाती है।

समय के साथ यही गांव ग्राम पंचायत के रूप में अस्तित्व में आया और पदम सिंह ने यहां से सरपंच का चुनाव लड़ा।

अब ग्रामीणों ने उन्हें अपना पहला सरपंच चुन लिया है। इस तरह पाकिस्तान के छाछरो से शुरू हुई उनकी जीवन यात्रा भारत के छाछरो में एक नई जिम्मेदारी तक पहुंच गई।

सोढ़ा परिवार की ऐतिहासिक विरासत फिर चर्चा में

पदम सिंह की जीत के बाद क्षेत्र में सोढ़ा परिवार के इतिहास और 1971 के युद्ध में उसके योगदान की चर्चा फिर तेज हो गई है।

परिवार का संबंध लंबे समय तक सिंध के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से भी रहा है। वहीं भारत आने के बाद परिवार के सदस्यों ने स्थानीय राजनीति और समाज में अपनी पहचान बनाई।

पदम सिंह की चुनावी जीत को इसी ऐतिहासिक विरासत के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है।

करीब पांच दशक पहले जिस व्यक्ति को अपना घर और जमीन छोड़कर सीमा पार आना पड़ा था, आज उसी व्यक्ति को 77 वर्ष की उम्र में अपने नए गांव की बागडोर मिली है।

बाड़मेर की यह कहानी केवल एक सरपंच चुनाव का परिणाम नहीं, बल्कि सरहद, स्मृतियों और नई पहचान के बीच जुड़े एक लंबे सफर की कहानी भी है।