जहां कभी लबालब रहता था तालाब, वहां अब सूखी मिट्टी; 100 गांवों की पानी की आस टूटी, मवेशियों के लिए ₹1200 में टैंकर
बाड़मेर के देताणी गांव में करीब 100 साल पुराना तालाब इस बार कमजोर बारिश के कारण सूख गया है। पानी और चारे की कमी से ग्रामीण और पशुपालक परेशान हैं।
पश्चिमी राजस्थान में इस बार कमजोर बारिश ने ग्रामीण इलाकों के सामने पानी का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। बाड़मेर के शिव क्षेत्र के देताणी गांव में करीब 100 साल पुराना तालाब, जो हर साल मानसून के बाद पानी से भर जाता था, इस बार सूखा पड़ा है। कभी इस तालाब से देताणी के साथ आसपास के करीब 100 गांवों तक पानी पहुंचता था, लेकिन अब तालाब की तलहटी में पानी की जगह सूखी और पथराई मिट्टी नजर आ रही है।
करीब 2500 की आबादी वाले देताणी गांव में पानी का यह संकट सिर्फ लोगों तक सीमित नहीं है। यहां बड़ी संख्या में परिवार खेती के साथ पशुपालन पर निर्भर हैं। बारिश कम होने से खेतों में चारा भी नहीं उगा और तालाब में पानी नहीं आया। ऐसे में ग्रामीणों के सामने अपने पशुधन के लिए पानी जुटाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
कभी 4-5 महीने तक चलता था तालाब का पानी
ग्रामीणों के मुताबिक, सितंबर के बाद तालाब में पानी जमा हो जाता था और गर्मियों तक इसका इस्तेमाल होता रहता था। देताणी ही नहीं, बल्कि आसपास के 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में बसे कई गांवों के लोग भी यहां से पानी ले जाते थे। ऊंट-गाड़ियों, बैलगाड़ियों और दूसरे साधनों से पानी घरों और पशुओं के लिए पहुंचाया जाता था।
इस बार बारिश की कमी ने पूरा चक्र बिगाड़ दिया है। मानसून के बाद जिस तालाब में पानी दिखाई देता था, वहां अब सूखी जमीन नजर आ रही है।
मवेशियों के लिए हर कुछ दिन में खरीदना पड़ रहा पानी
देताणी और आसपास के गांवों में बड़ी संख्या में परिवार पशुपालन करते हैं। कई घरों में गोवंश के साथ भेड़-बकरियों के बड़े रेवड़ हैं। ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ी चिंता इन्हें पानी उपलब्ध कराने की है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, ट्यूबवेल से एक टैंकर पानी मंगवाने में करीब 1000 से 1200 रुपये खर्च हो रहे हैं। बड़े रेवड़ के लिए लगभग हर चार-पांच दिन में एक टैंकर की जरूरत पड़ रही है। लगातार पानी खरीदने का यह खर्च ग्रामीण परिवारों की आर्थिक मुश्किलें भी बढ़ा रहा है।
बारिश नहीं हुई तो चारे का संकट भी गहराया
पानी की कमी के साथ चारे की समस्या ने भी ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा दी है। बारानी खेती और पशुपालन पर निर्भर इस इलाके में पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेतों में पशुओं के लिए जरूरी चारा नहीं उग सका। ऐसे में एक तरफ पशुओं के लिए पानी खरीदना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ चारे का इंतजाम भी चुनौती बन गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर आने वाले समय में हालात नहीं सुधरे तो पानी और चारे की समस्या और गंभीर हो सकती है। तालाब जैसे पारंपरिक जलस्रोतों के सूख जाने से पशुपालकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
तालाब सूखा तो गांव की पूरी व्यवस्था पर असर
देताणी का यह तालाब सिर्फ पानी जमा करने का स्थान नहीं था, बल्कि ग्रामीण जीवन और पशुपालन व्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है। बरसात के बाद कई महीनों तक उपलब्ध रहने वाला पानी ग्रामीणों के खर्च को कम करता था और पशुओं के लिए भी बड़ा सहारा था।
इस बार तालाब सूखा होने से पानी के लिए टैंकर पर निर्भरता बढ़ गई है। अब ग्रामीणों की नजर बारिश और प्रशासन की ओर है कि आने वाले दिनों में पानी और पशुओं के चारे को
लेकर क्या राहत मिलती है।

