मंगोलिया से राजस्थान तक 2 हजार KM की उड़ान: बीकानेर पहुंचे हजारों कुरजां, 40°C गर्मी भी नहीं रोक पाई सफर

बीकानेर के लूणकरनसर में कुरजां यानी Demoiselle Cranes का आगमन शुरू हो गया है। मंगोलिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर पहुंचे इन प्रवासी पक्षियों की संख्या करीब 20 हजार बताई जा रही है।

मंगोलिया से राजस्थान तक 2 हजार KM की उड़ान: बीकानेर पहुंचे हजारों कुरजां, 40°C गर्मी भी नहीं रोक पाई सफर

हजारों किलोमीटर का आसमान... रास्ते में पहाड़, रेगिस्तान और बदलता मौसम... लेकिन मंजिल वही राजस्थान।

सर्दियों के खास मेहमान माने जाने वाले कुरजां यानी Demoiselle Cranes एक बार फिर बीकानेर जिले के लूणकरनसर क्षेत्र में पहुंचने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि पश्चिमी मंगोलिया के अल्ताई पर्वतीय इलाके से उड़ान भरकर ये पक्षी चीन सहित लंबा अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्ग तय करते हुए राजस्थान पहुंचे हैं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीकानेर में दिन का तापमान अभी भी काफी ऊंचा बना हुआ है। इसके बावजूद प्रकृति की अपनी घड़ी के अनुसार कुरजां का आगमन शुरू हो चुका है।

करीब 2 हजार KM का सफर, फिर राजस्थान में पड़ाव

कुरजां दुनिया के प्रमुख प्रवासी पक्षियों में शामिल हैं।

हर साल मौसम बदलने के साथ इनकी बड़ी संख्या मध्य एशिया और मंगोलिया के इलाकों से भारत की ओर प्रवास करती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इन पक्षियों ने इस बार भी पश्चिमी मंगोलिया के अल्ताई क्षेत्र से यात्रा शुरू की और चीन के रास्ते होते हुए राजस्थान तक पहुंचने का लंबा सफर तय किया।

यह यात्रा सिर्फ दूरी का मुकाबला नहीं है।

तेज हवाएं, ऊंचाई, भोजन की कमी और मौसम में अचानक बदलाव जैसी कई चुनौतियों का सामना करते हुए ये पक्षी अपनी निर्धारित मंजिल तक पहुंचते हैं।

40 डिग्री की गर्मी... फिर भी समय पर पहुंची कुरजां

आमतौर पर प्रवासी पक्षियों का आगमन ठंडे मौसम से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन बीकानेर में तापमान करीब 40 डिग्री सेल्सियस तक बने रहने के बावजूद कुरजां का पहुंचना पक्षी प्रेमियों और विशेषज्ञों के लिए खास आकर्षण बना हुआ है।

पक्षियों का यह प्रवास बताता है कि उनका मूवमेंट सिर्फ स्थानीय तापमान से तय नहीं होता, बल्कि दिन की लंबाई, मौसम चक्र और जैविक प्रवृत्ति जैसे कई संकेत इसमें भूमिका निभाते हैं।

लूणकरनसर में हजारों पक्षियों का डेरा

जानकारी के अनुसार इस सीजन अब तक करीब 20 हजार कुरजां पक्षियों के पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

झुंड में उड़ते इन पक्षियों की कतारें आसमान में बेहद खूबसूरत दृश्य बनाती हैं।

जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ती है, लूणकरनसर और आसपास के इलाके पक्षी प्रेमियों तथा वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर्स के लिए भी खास आकर्षण बन जाते हैं।

GPS बताएगा—कहां रुकी कुरजां, किस रास्ते राजस्थान पहुंची

कुरजां के प्रवास को अब सिर्फ दूरबीन से नहीं, तकनीक की मदद से भी समझा जा रहा है।

इन पक्षियों की आवाजाही और माइग्रेशन रूट को समझने के लिए कुछ पक्षियों को GPS ट्रैकिंग सिस्टम से ट्रैक किए जाने की जानकारी है।

इससे वैज्ञानिक यह जान सकते हैं कि पक्षी किस रास्ते से आगे बढ़े, बीच में कहां रुके और यात्रा में कितना समय लगा।

ऐसे डेटा से बदलती जलवायु का प्रवासी पक्षियों के व्यवहार पर पड़ने वाला प्रभाव समझने में भी मदद मिल सकती है।

राजस्थान की संस्कृति में सिर्फ पक्षी नहीं, भावनाओं का नाम है 'कुरजां'

कुरजां का रिश्ता राजस्थान से सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है।

राजस्थान के लोकगीतों में कुरजां को अक्सर विरह, प्रेम और संदेशवाहक के रूप में याद किया गया है।

लोक परंपराओं में दूर देश जा रहे प्रियजन तक संदेश पहुंचाने की कल्पना कुरजां के जरिए की जाती रही है।

इसी वजह से राजस्थान में इन पक्षियों का आगमन सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि संस्कृति और स्मृतियों से जुड़ा अनुभव भी माना जाता है।

हर साल हजारों किलोमीटर की उड़ान, लेकिन मंजिल राजस्थान

कुरजां के झुंड हर साल लगभग एक ही प्रवासी रास्ते पर लौटते हैं।

उनके लिए राजस्थान के जलस्रोत, खुले मैदान और रेगिस्तानी क्षेत्र सुरक्षित पड़ाव का काम करते हैं।

बीकानेर जिले का लूणकरनसर भी ऐसे ही इलाकों में शामिल है। लूणकरनसर बीकानेर जिले का हिस्सा है।

इन पक्षियों का हर साल लौटना प्रकृति की उस अद्भुत नेविगेशन क्षमता की कहानी भी है, जिसमें बिना किसी मानव सहायता के पक्षी महाद्वीपों के बीच हजारों किलोमीटर की यात्रा पूरी करते हैं।