जल जीवन मिशन में CAG का बड़ा खुलासा: बिना जांच ठेकेदारों को ₹122 करोड़ का भुगतान, फर्जी बिलों से भी निकले करोड़ों

राजस्थान में जल जीवन मिशन पर CAG रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं। 26 परियोजनाओं में ₹122.31 करोड़ भुगतान, ₹7.7 करोड़ के कथित फर्जी बिल और पानी की गुणवत्ता बजट पर सवाल उठे।

जल जीवन मिशन में CAG का बड़ा खुलासा: बिना जांच ठेकेदारों को ₹122 करोड़ का भुगतान, फर्जी बिलों से भी निकले करोड़ों

राजस्थान में हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के लिए चल रहे जल जीवन मिशन (JJM) के कामकाज को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने कई गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। मामला सिर्फ काम में देरी या बजट खर्च नहीं होने तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में ठेकेदारों को भुगतान, बिलों की सत्यता, टेंडर प्रक्रिया, पानी की गुणवत्ता की निगरानी और सरकारी धन के इस्तेमाल तक पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 26 क्षेत्रीय जलापूर्ति परियोजनाओं में थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन और सर्टिफिकेशन की निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए बिना दिसंबर 2024 तक ठेकेदारों को ₹122.31 करोड़ का भुगतान कर दिया गया।

कथित फर्जी बिलों से ₹7.7 करोड़ का भुगतान

CAG ऑडिट में चयनित कार्यों की जांच के दौरान कथित तौर पर मनगढ़ंत और फर्जी बिलों का मामला भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार दूसरे ठेकेदारों के बिलों के आधार पर करीब ₹7.7 करोड़ के अनियमित भुगतान किए गए। इसके अलावा करौली से जुड़ा एक मामला भी सवालों के घेरे में आया। रिपोर्ट के मुताबिक निविदा खोले जाने से पहले ही पाइप खरीद लिए गए थे। बाद में आवश्यक NOC जारी होने से पहले ही इन पाइपों को सोजत सिटी ट्रांसफर कर दिया गया। CAG ने इस घटनाक्रम के जरिए खरीद और टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

शिलान्यास कार्यक्रमों पर ₹3.28 करोड़ खर्च

जल जीवन मिशन की राशि के इस्तेमाल को लेकर भी रिपोर्ट में आपत्ति दर्ज की गई है। जून 2024 में रिकॉर्ड की जांच के दौरान सामने आया कि वित्त वर्ष 2022-23 में विभिन्न जलापूर्ति परियोजनाओं के शिलान्यास कार्यक्रमों पर करीब ₹3.28 करोड़ खर्च किए गए। CAG के मुताबिक यह खर्च जल जीवन मिशन की गाइडलाइन के अनुरूप नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ने नवंबर 2025 में जवाब दिया कि शिलान्यास समारोहों पर खर्च वित्त विभाग की मंजूरी के बाद किया गया था। हालांकि, CAG ने इस जवाब को स्वीकार नहीं किया और इसे मिशन की गाइडलाइन का उल्लंघन मानते हुए आपत्ति दर्ज की।

पानी की क्वालिटी के लिए 486 करोड़, खर्च सिर्फ 40 करोड़

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू सीधे पानी की गुणवत्ता से जुड़ा है। साल 2019 से 20 जनवरी 2025 तक पानी की गुणवत्ता की निगरानी और सर्विलांस गतिविधियों के लिए ₹486.23 करोड़ का बजट उपलब्ध था। इसमें से महज ₹40.39 करोड़ खर्च किए गए। यानी उपलब्ध राशि का केवल 8.31 प्रतिशत इस्तेमाल हुआ और ₹445.84 करोड़ यानी 91.69 प्रतिशत राशि खर्च नहीं हुई। यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि जल जीवन मिशन का उद्देश्य केवल घर तक नल पहुंचाना नहीं, बल्कि सुरक्षित और निर्धारित गुणवत्ता वाला पेयजल उपलब्ध कराना भी है।

14 गांवों के 1.52 लाख से ज्यादा परिवारों को करना पड़ा इंतजार

CAG रिपोर्ट में परियोजनाओं को समय पर पूरा नहीं करने के असर का भी जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार विभागीय स्तर पर टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी और निविदाएं रद्द होने के कारण सितंबर 2024 तक संबंधित काम आगे नहीं बढ़ पाया। इसका असर बारां, झालावाड़ और कोटा के 14 गांवों के 1,52,437 ग्रामीण परिवारों पर पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक इन परिवारों को तीन साल से ज्यादा समय तक जल जीवन मिशन के तहत अपेक्षित जलापूर्ति का लाभ नहीं मिल सका।

बारां परियोजना में टेंडर प्रक्रिया पर सवाल

बारां की क्षेत्रीय जलापूर्ति परियोजना को लेकर भी CAG ने गंभीर टिप्पणी की है। रिपोर्ट के अनुसार ठेकेदारों द्वारा कार्य पूरा करने की समयसीमा लगातार बढ़ाई गई और काम में देरी होती रही। साथ ही विभाग द्वारा निविदाओं को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में भी निष्क्रियता की ओर इशारा किया गया। CAG ने टेंडरों को अंतिम रूप देने में हुई देरी और पूरी प्रक्रिया के प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं।

122 करोड़ का सवाल सबसे बड़ा

पूरी रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल उस ₹122.31 करोड़ के भुगतान का है, जिसके बारे में CAG ने कहा है कि 26 क्षेत्रीय जलापूर्ति परियोजनाओं में निर्धारित थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन और सर्टिफिकेशन का पालन किए बिना भुगतान किया गया। इसके साथ कथित फर्जी बिलों से ₹7.7 करोड़ के अनियमित भुगतान, शिलान्यास कार्यक्रमों पर ₹3.28 करोड़ खर्च और जल गुणवत्ता निगरानी के बजट का 91.69 प्रतिशत खर्च न होना मिशन के वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन पर कई सवाल खड़े करता है। एक तरफ मिशन का लक्ष्य ग्रामीण परिवारों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना था, दूसरी तरफ CAG की रिपोर्ट बताती है कि कहीं पैसा बिना निर्धारित जांच के भुगतान हुआ, कहीं गुणवत्ता निगरानी का बजट पड़ा रहा और कहीं परियोजनाओं की देरी का असर सीधे ग्रामीण परिवारों पर पड़ा। अब इन ऑडिट आपत्तियों पर सरकार और संबंधित विभाग की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।