JEN से सांसद तक: मुरारीलाल मीना की राजनीति का अनोखा सफर

"राजेश पायलट के शिष्य से सांसद तक: मुरारी लाल मीना की अलग छवि ने राजनीति में बनाई अलग पहचान

JEN से सांसद तक: मुरारीलाल मीना की राजनीति का अनोखा सफर

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जो किसी राजनीतिक विरासत के सहारे नहीं, बल्कि अपने संघर्ष, संगठन क्षमता और जमीनी पकड़ के दम पर पहचान बनाते हैं। दौसा से कांग्रेस सांसद मुरारी लाल मीना भी ऐसे ही नेताओं में शुमार हैं।  20 जुलाई 1960 को दौसा जिले की बसवा तहसील के छोटे से गांव अलियापाड़ा में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे मुरारी लाल मीना ने अपनी शुरुआती जिंदगी अभावों के बीच बिताई। सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने सरकारी सेवा में पीडब्ल्यूडी विभाग में जूनियर इंजीनियर (JEN) के रूप में नौकरी शुरू की, लेकिन उनका मन सरकारी फाइलों से ज्यादा जनता के बीच काम करने में लगता था। इसलिए वे स्वर्गीय राजेश पायलट के पीएस बन गए। 

 

राजेश पायलट के साथ सीखी राजनीति:

मुरारी लाल मीना के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ जब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय राजेश पायलट के निजी सचिव (PS) बने। राजेश पायलट के साथ रहते हुए उन्होंने राजनीति की बारीकियां, संगठन की ताकत और जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की कला सीखी।कहा जाता है कि पायलट की राजनीति ने ही मुरारी मीना को जननेता बनने की राह दिखाई। यही कारण है कि आज भी उन्हें दौसा क्षेत्र में राजेश पायलट की राजनीतिक विरासत से जुड़ा नेता माना जाता है। इसलिए मुरारी लाल मीना को स्वर्गीय राजेश पायलट का शिष्य माना जाता है। आज भी उनकी सचिन पायलट से घनिष्ठता है, जो जग जाहिर है। 

जब कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया...

राजनीति में हर नेता का एक संघर्षकाल होता है। मुरारी लाल मीना के जीवन में भी ऐसा दौर आया जब कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जब केंद्रीय मंत्री  स्वर्गीय राजेश पायलट का 2000 में सड़क हादसे में निधन हो गया तो मुरारी मीना अकेले पड़ गए, क्योंकि उनके राजनीतिक गुरु इस दुनियां में नहीं रहे थे। कांग्रेस के नेताओं से भी उनका संपर्क था  लेकिन अब पहले जैसी धार नहीं थी। मुरारी मीना ने कांग्रेस से अपनी पत्नी के लिए टिकट मांगा  लेकिन कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो  सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी सविता मीना को बांदीकुई से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा। इसके बाद वर्ष 2003 में खुद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर चुनाव लड़ा और प्रदेश में सबसे अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में सनसनी फैला दी।

यह जीत केवल एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व को दिया गया एक राजनीतिक संदेश भी था कि दौसा की जमीन पर मुरारी मीना की पकड़ कितनी मजबूत है।


सामान्य सीटों से चुनाव लड़ने वाले मीणा नेता:

राजस्थान की राजनीति में यह बात मुरारी लाल मीना को अलग पहचान देती है कि उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक सफर सामान्य सीटों से चुनाव लड़कर तय किया है। जातीय समीकरणों और आरक्षित सीटों की राजनीति के दौर में सामान्य सीटों पर लगातार जीत दर्ज करना उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत को दर्शाता है। बांदीकुई और दौसा विधानसभा क्षेत्रों से विधायक बनने के बाद उन्होंने राज्य सरकार में पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और बाद में कृषि विपणन राज्यमंत्री के रूप में भी जिम्मेदारियां निभाईं। 2008 में वे बसपा से जीते थे । बसपा विधायकों ने गहलोत सरकार को समर्थन दिया और उन्हें मंत्री बनाया गया। 2013 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस ने दौसा से लड़ाया लेकिन वे चुनाव हार गए इसके बाद हुए 2018 के चुनाव में वे दौसा से चुनाव जीते और गहलोत सरकार में मंत्री भी बने।  2023 के विधानसभा चुनाव में भी मुरारी मीना दौसा से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। 

परिवार भी राजनीति और प्रशासन में सक्रिय:

मुरारी लाल मीना का परिवार भी आज अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुका है। पत्नी सविता मीना लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

उनके दो बेटे हैं। एक बेटा बीटेक कर निजी क्षेत्र में कार्यरत है, जबकि दूसरा बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी बनकर परिवार का नाम रोशन कर चुका है। वहीं उनकी बेटी कानून की पढ़ाई (LLM) कर रही हैं और युवा कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इस तरह मुरारी मीना का परिवार राजनीति, प्रशासन और शिक्षा तीनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान रखता है।

 


2024 में संसद तक पहुंचा संघर्ष:

 लेकिन जब लोकसभा चुनाव आए तो कांग्रेस के पास दौसा से कोई ऐसा दमदार नेता नहीं था जो सबको स्वीकार्य हो । ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व ने मुरारी मीना को चुनाव मैदान में उतार दिया ।  चार बार विधायक रहने के बाद वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव मुरारी लाल मीना के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव साबित हुआ। कांग्रेस ने उन्हें दौसा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत हासिल कर संसद में प्रवेश किया। मुरारी मीना ने इस चुनाव में पूर्व मंत्री कन्हैयालाल मीना को करीब 2 लाख से ज्यादा वोटो से हराकर एक नया संदेश दिया , जबकि इस सीट पर पीएम मोदी और डॅा. किरोड़ी लाल मीना दोनों ने रोड़ शो किया था। अब उनकी जिम्मेदारी केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे दौसा संसदीय क्षेत्र की आवाज को दिल्ली तक पहुंचाने की है।

 

क्या है मुरारी मीना की सबसे बड़ी ताकत?

मुरारी लाल मीना की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी राजनीति, कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और हर परिस्थिति में संघर्ष करने की क्षमता मानी जाती है। जेईएन की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए इस नेता ने कभी हार नहीं मानी।
कांग्रेस से नाराज हुए तो बसपा से जीतकर दिखाया, मंत्री बने तो प्रशासनिक अनुभव हासिल किया और अंततः संसद तक पहुंचकर यह साबित कर दिया कि राजनीति में संघर्ष और धैर्य का कोई विकल्प नहीं होता।
दौसा की राजनीति में आज भी मुरारी लाल मीना को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने सत्ता से ज्यादा संगठन और जनता के भरोसे को अपनी ताकत बनाया।


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