राजस्थान में क्रांतिकारी कदम: 'मृत शरीर सम्मान अधिनियम' लागू, शव के साथ विरोध पर 5 साल की सजा
राजस्थान सरकार ने मृतकों की गरिमा की रक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 'मृत शरीर सम्मान अधिनियम, 2023' को पूर्ण रूप से लागू कर दिया है।
जयपुर। राजस्थान सरकार ने मृतकों की गरिमा की रक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 'मृत शरीर सम्मान अधिनियम, 2023' को पूर्ण रूप से लागू कर दिया है। 4 दिसंबर को जारी अधिसूचना के बाद यह कानून अब पूरी तरह प्रभावी हो चुका है, जिसके तहत शव को सड़क, अस्पताल या किसी सार्वजनिक स्थान पर रखकर विरोध प्रदर्शन करना गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषियों को 6 महीने से 5 साल तक की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा हो सकती है। राज्य सरकार का दावा है कि राजस्थान इस तरह के कानून को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है, जो मृतक के सम्मान को सर्वोपरि मानते हुए समाज में अनुशासन स्थापित करेगा।
कानून का उद्देश्य: मृतक की गरिमा और कानून व्यवस्था की रक्षा
राजस्थान में अक्सर हादसों, हत्याओं या अन्य अस्वाभाविक मौतों के बाद परिजन या संगठन शव को सड़क पर रखकर मुआवजा, नौकरी या अन्य मांगें पूरी कराने के लिए धरना देते हैं। इससे न केवल ट्रैफिक जाम और कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है, बल्कि शव के सड़ने से मृतक की गरिमा का भी अपमान होता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ऐसी प्रथाओं पर पूर्ण रोक लगाना है। अधिनियम मृत व्यक्ति को 'समयबद्ध और सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार' प्रदान करता है, जो समुदाय या धर्म की परंपराओं के अनुसार होना चाहिए।
कानून के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:
अंतिम संस्कार की समय सीमा: मौत के बाद 24 घंटे के भीतर अंतिम संस्कार अनिवार्य। यदि परिजन ऐसा नहीं करते, तो पुलिस या जिला प्रशासन शव को कब्जे में लेकर स्वयं संस्कार कर सकता है।
विरोध प्रदर्शन पर सजा: यदि कोई व्यक्ति, संगठन, नेता या गैर-परिजन शव का उपयोग विरोध के लिए करता है, तो 6 महीने से 5 साल तक की कैद और जुर्माना। परिजनों को सहमति देने पर भी 2 साल तक की सजा का प्रावधान।
देरी की सीमित छूट: केवल विशेष परिस्थितियों में देरी की अनुमति, जैसे पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया, परिजनों का विदेश या दूर-दराज में होना, या प्राकृतिक आपदा। लेकिन राजनीतिक या सामाजिक दबाव में देरी बर्दाश्त नहीं।
अनकहे शवों का प्रबंधन: यदि कोई परिवार शव नहीं लेता, तो उन्हें 1 साल तक की कैद या जुर्माना। प्रशासन को तुरंत संस्कार करने का अधिकार।
यह अधिनियम 2023 में विधानसभा से पारित हुआ था, लेकिन पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान पूरी तरह लागू नहीं हो सका। वर्तमान भाजपा सरकार ने इसे मई 2024 में समीक्षा के बाद सख्ती से लागू किया। गृह विभाग की विशेष सचिव अनुप्रेर्णा सिंह कुंतल ने पुष्टि की कि कानून कानूनी विभाग से जांचित है और अब सक्रिय रूप से निगरानी की जा रही है।
जनता की प्रतिक्रियाएं: सराहना के साथ कुछ सुझाव
जयपुर की सड़कों पर लोगों ने इस कानून का स्वागत किया है। आमजन का मानना है कि यह मृतक के सम्मान को बचाएगा और अनावश्यक प्रदर्शनों पर अंकुश लगाएगा। जयपुर के निवासी रामस्वरूप सोनी ने कहा, "यह नियम मृतक की गरिमा की रक्षा करेगा। शव का राजनीतिकरण बंद हो जाएगा, जो समाज के लिए शुभ है।" वहीं, राकेश कुमार ने सुझाव दिया, "कानून अच्छा है, लेकिन विदेश में रहने वाले परिजनों के लिए छूट बढ़ानी चाहिए। यात्रा में समय लगता है।"
हालांकि, आदिवासी समुदायों से कुछ विरोध की आवाजें उठी हैं। 2023 में विधानसभा बहस के दौरान आदिवासी विधायक दिव्या मदेरणा ने कहा था कि यह विधेयक उनकी 'मौताणा' प्रथा के खिलाफ है, जहां मौत के बाद आरोपी से आर्थिक मुआवजा लिया जाता है। उन्होंने मांग की कि आदिवासी क्षेत्रों में छूट दी जाए। विपक्ष के नेता राजेंद्र राठौड़ ने भी सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर जोर दिया था। लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि मौजूदा पीड़ित मुआवजा योजना से ऐसी मांगें पूरी हो सकती हैं।
भविष्य की उम्मीदें: सुशासन का नया अध्याय
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार ने इसे 'सुशासन' का हिस्सा बताते हुए कहा है कि यह कानून न केवल मृतकों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर शांति बनाए रखेगा। पहले ऐसे मामलों में पहला केस सितंबर 2023 में दर्ज हुआ था, और अब सख्त प्रवर्तन से अपराध दर में कमी की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून अन्य राज्यों के लिए मिसाल बनेगा, जहां शव प्रदर्शनों की समस्या आम है।
राजस्थान सरकार ने जागरूकता अभियान शुरू करने की घोषणा की है, जिसमें अस्पतालों, पुलिस थानों और सामुदायिक केंद्रों पर पोस्टर लगाए जाएंगे। साथ ही, हेल्पलाइन नंबर जारी किया जाएगा ताकि परिजन समय पर सहायता ले सकें। इस कानून से न केवल मृतक की गरिमा बचेगी, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों को मजबूती मिलेगी।

