Kuravi का वीरभद्र स्वामी मंदिर: जहां मन्नत पूरी होने पर भक्त करते हैं अनोखी परिक्रमा

Sri Veerabhadra Swamy Temple Kuravi दक्षिण भारत का करीब 1000 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है। Maha Shivaratri पर यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अनोखी परिक्रमा परंपरा निभाते हैं।

Kuravi का वीरभद्र स्वामी मंदिर: जहां मन्नत पूरी होने पर भक्त करते हैं अनोखी परिक्रमा
Sri Veerabhadra Swamy Temple Kuravi

दक्षिण भारत के प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में अपनी विशेष पहचान रखने वाला Sri Veerabhadra Swamy Temple Kuravi आज भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। करीब एक हजार वर्ष पुराने इस मंदिर का इतिहास वेंगी चालुक्य वंश से जुड़ा हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि लगभग वर्ष 900 ईस्वी के आसपास वेंगी चालुक्य शासक Bhima Raju ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में काकतीय शासक Beta Raju I ने मंदिर की मरम्मत और संरक्षण करवाया।

इतिहास और धार्मिक आस्था से जुड़ा यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। दूर-दराज से भक्त यहां भगवान वीरभद्र स्वामी के दर्शन करने आते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

गर्भगृह में रौद्र रूप में विराजमान हैं भगवान

मंदिर के गर्भगृह में भगवान वीरभद्र स्वामी की प्रतिमा रौद्र रूप में स्थापित है। उनकी दस भुजाएं और तीन आंखें शक्ति, साहस और पराक्रम का प्रतीक मानी जाती हैं। मुख्य प्रतिमा के साथ ही माता भद्रकाली की सौम्य प्रतिमा भी स्थापित है, जो भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।

इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता यह भी है कि भगवान वीरभद्र स्वामी की प्रतिमा का मुख पश्चिम दिशा की ओर है। दक्षिण भारत के मंदिरों में यह व्यवस्था बहुत कम देखने को मिलती है, इसलिए यह मंदिर अपनी इस खास परंपरा के कारण भी प्रसिद्ध है।

अनोखी परंपरा शरीर से की जाती है परिक्रमा

मंदिर की सबसे चर्चित परंपराओं में से एक है शरीर के माध्यम से की जाने वाली परिक्रमा। यहां श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर गीले कपड़ों में जमीन पर लेटकर मंदिर की परिक्रमा करते हैं।

भक्तों का विश्वास है कि इस तरह की परिक्रमा करने से शरीर और मन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस परंपरा को निभाते हुए मंदिर में परिक्रमा करते दिखाई देते हैं।

चढ़ावे में दिखती है धार्मिक विविधता

कुरवी मंदिर की एक और विशेषता यहां की धार्मिक परंपराओं की विविधता है। मुख्य मंदिर में भगवान वीरभद्र स्वामी को शाकाहारी भोग लगाया जाता है। वहीं मंदिर के दक्षिण दिशा में स्थित माता भद्रकाली के मंदिर में अलग परंपरा देखने को मिलती है।

यहां कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर मुर्गी की बलि और शराब का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। यह परंपरा स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदाय की आस्था से जुड़ी मानी जाती है।

महाशिवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

प्रसिद्ध Medaram Jatara के बाद कुरवी मंदिर को गिरिजन और आदिवासी समुदायों का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है। विशेष रूप से Maha Shivaratri के अवसर पर यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अनुमान है कि इस दौरान करीब 15 लाख भक्त मंदिर में आते हैं।

मंदिर में कैसे पहुंचे

यह मंदिर Mahabubabad शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए बस और ऑटो की सुविधा आसानी से उपलब्ध रहती है। मंदिर सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है, हालांकि दोपहर में कुछ समय के लिए मंदिर के द्वार बंद किए जाते हैं।

मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए किफायती कमरों की व्यवस्था भी की गई है, जिससे दूर-दराज से आने वाले भक्तों को सुविधा मिलती है।