'अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ाने से देवता पूजा स्वीकार नहीं करते' — भोपाल में कथा के दौरान देवकीनंदन ठाकुर का दावा

भोपाल में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान देवकीनंदन ठाकुर ने पूजा-पद्धति, अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ाने की परंपरा, बच्चों के संस्कार और देर रात होने वाले विवाहों को लेकर अपने विचार रखे। जानिए क्या कहा कथावाचक ने।

'अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ाने से देवता पूजा स्वीकार नहीं करते' — भोपाल में कथा के दौरान देवकीनंदन ठाकुर का दावा

भोपाल के रुद्राक्ष किंग्सटन परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक Devkinandan Thakur ने धार्मिक आस्था, पूजा-पद्धति और विवाह परंपराओं को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। कथा के दौरान उनके बयानों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भी चर्चा रही।

कथा में संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि सनातन परंपरा में किसकी पूजा को मान्यता दी गई है और किसकी नहीं। उनके अनुसार, शास्त्रों में पूजनीय और अपूज्य का स्पष्ट उल्लेख मिलता है और धार्मिक आचरण उसी के अनुरूप होना चाहिए।

'अपूज्य की पूजा से बढ़ सकती हैं परेशानियां'

देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि जिनकी पूजा सनातन धर्म में पूजनीय नहीं मानी गई है, उनकी आराधना करने से व्यक्ति और परिवार को आध्यात्मिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक जीवन में शास्त्रों के बताए मार्ग का पालन करना आवश्यक है।

उनके इस बयान पर कथा स्थल पर मौजूद श्रद्धालुओं ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और बड़ी संख्या में लोगों ने कथा का श्रवण किया।

अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ाने का किया उल्लेख

कथा के दौरान देवकीनंदन ठाकुर ने कुछ लोगों द्वारा मनोकामना पूरी होने पर Ajmer Sharif Dargah पर चादर चढ़ाने की परंपरा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था का केंद्र शास्त्रसम्मत होना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने दावा किया कि ऐसे स्थानों पर श्रद्धा व्यक्त करने के बाद देवता उनकी पूजा स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उनके अनुसार वह सनातन परंपरा के पूजनीय स्थलों की श्रेणी में नहीं आते। उनके इस बयान को लेकर भी कथा स्थल पर चर्चा रही।

बच्चों को धार्मिक आयोजनों से जोड़ने की अपील

देवकीनंदन ठाकुर ने अभिभावकों से अपने बच्चों को कथा और धार्मिक आयोजनों में साथ लाने की अपील की। उन्होंने कहा कि संस्कारों की शुरुआत बचपन से होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कई बार जो बातें बड़े लोगों को समझने में समय लगता है, उन्हें बच्चे सहज रूप से ग्रहण कर लेते हैं। इसलिए परिवारों को नई पीढ़ी को धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।

देर रात होने वाले विवाहों पर जताई चिंता

कथावाचक ने आधुनिक विवाह परंपराओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में विवाह गोधूलि बेला में संपन्न कराने की परंपरा रही है, लेकिन वर्तमान समय में अधिकांश विवाह देर रात आयोजित किए जाते हैं। उनके अनुसार रात्रि का समय विवाह संस्कार के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। उन्होंने कहा कि परंपरागत समय से हटकर होने वाले विवाहों का असर वैवाहिक जीवन पर भी पड़ सकता है और इससे दांपत्य जीवन में तनाव बढ़ने की आशंका रहती है।