पचपदरा रिफाइनरी में 7 साल की देरी: गहलोत का BJP पर आरोप, क्या क्रेडिट पॉलिटिक्स बना कारण?
पचपदरा रिफाइनरी प्रोजेक्ट को लेकर सियासत तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने परियोजना में 7 साल की देरी और बढ़ी लागत के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि बीजेपी ने जानबूझकर प्रोजेक्ट की गति धीमी रखी ताकि उद्घाटन का श्रेय खुद ले सके। वहीं बीजेपी इसे तकनीकी और वित्तीय कारणों का परिणाम बता रही है। 21 अप्रैल को प्रस्तावित उद्घाटन के बीच यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। रिफाइनरी अब विकास के साथ-साथ सियासी रणनीति का भी प्रतीक बन चुकी है।
पचपदरा में बन रही रिफाइनरी को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot ने इस परियोजना में हुई करीब 7 साल की देरी और लागत में भारी बढ़ोतरी को लेकर बीजेपी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गहलोत का आरोप है कि यह देरी सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रही है।
गहलोत के मुताबिक, कांग्रेस सरकार के समय इस रिफाइनरी प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाया गया था, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई। उनका कहना है कि बीजेपी ने इस परियोजना को जानबूझकर धीमा किया, ताकि उद्घाटन और श्रेय अपने कार्यकाल में ले सके। यानी, जो काम कांग्रेस सरकार ने शुरू किया, उसका राजनीतिक लाभ बीजेपी उठाना चाहती थी।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अक्सर सियासी श्रेय की लड़ाई में फंस जाते हैं। पचपदरा रिफाइनरी भी इसी का एक उदाहरण बनती नजर आ रही है। इस परियोजना की लागत, जो शुरुआती दौर में काफी कम थी, अब लगभग दोगुनी बताई जा रही है। गहलोत ने इसे “भाजपा की अदूरदर्शिता और देरी की राजनीति” करार दिया है।
दूसरी ओर, बीजेपी का तर्क है कि परियोजना में देरी के पीछे तकनीकी, वित्तीय और नीतिगत कारण रहे हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया और अब इसका उद्घाटन 21 अप्रैल को किया जाना प्रस्तावित है, जिससे राजस्थान को पेट्रो-केमिकल हब के रूप में नई पहचान मिलेगी।
हालांकि, सवाल अब भी कायम हैं—क्या यह देरी वास्तव में तकनीकी वजहों से हुई या फिर इसके पीछे सियासी गणित काम कर रहा था? क्या एक सरकार के शुरू किए गए प्रोजेक्ट का श्रेय दूसरी सरकार लेना चाहती है?

पचपदरा रिफाइनरी अब सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं रही, बल्कि यह राजस्थान की सियासत का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। उद्घाटन की तारीख नजदीक है, लेकिन इसके साथ जुड़े सवाल और आरोप-प्रत्यारोप अभी भी जारी हैं।
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