सचिन पायलट होंगे 28 में कांग्रेस का चेहरा ?
राजस्थान कांग्रेस में चेहरे पर अभी मुकौटा है, लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएंगे इस बार सत्ता में वापसी के लिए बहुत बदलाव की जरूरत है और युवा मजबूत कंधों के जरिए आगे की रणनीति बनानी होगी।
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में एक सवाल धीरे-धीरे सबसे बड़ा राजनीतिक रहस्य बनता जा रहा है। क्या 2028 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करेगी? या फिर पार्टी कोई ऐसा फार्मूला निकालेगी जिसमें चेहरा कोई और होगा, लेकिन उसके पीछे सबसे बड़ा प्रभाव सचिन पायलट का होगा? क्योंकि राजनीति में सिर्फ वही नेता ताकतवर नहीं होता जो सामने दिखता है। कई बार असली ताकत उस नेता के पास होती है जो चेहरे तय करता है। राजस्थान कांग्रेस की अगली पीढ़ी की राजनीति को लेकर यही सबसे बड़ी बहस है।

एक तरफ सचिन पायलट हैं, जो पिछले दो दशकों से लगातार संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस का वह पुराना ढांचा है, जिसने हमेशा सामूहिक नेतृत्व और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी है। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि पायलट मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं। सवाल यह भी है कि अगर कांग्रेस उन्हें सीधे चेहरा नहीं बनाती, तो क्या पार्टी उनकी पसंद के किसी नेता को आगे बढ़ा सकती है? इस सवाल का जवाब समझने के लिए सचिन पायलट के पूरे राजनीतिक सफर को समझना जरूरी है।
7 सितंबर 1977 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जन्मे सचिन पायलट का सपना राजनीति नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना में पायलट बनने का था। लेकिन 11 जून 2000 को एक सड़क हादसे में पिता राजेश पायलट के निधन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई। साल 2002 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। शुरुआत से ही उन्होंने खुद को केवल विरासत के सहारे चलने वाले नेता के रूप में पेश नहीं किया। उन्होंने गांवों की धूल भरी पगडंडियों पर यात्राएं कीं, किसानों के बीच समय बिताया, युवाओं से संवाद किया और संगठन में अपनी जगह बनाई।
2004 में वे दौसा से सांसद बने और उस समय लोकसभा के सबसे युवा सांसदों में शामिल रहे। बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने। लेकिन असली चुनौती तब आई जब कांग्रेस राजस्थान में लगातार कमजोर होती जा रही थी। 2014 में जब कांग्रेस राजस्थान में लगभग साफ हो गई थी, तब पार्टी ने प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी सचिन पायलट को सौंपी। उस दौर में उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को खड़ा करने की कोशिश की। कार्यकर्ताओं के बीच लगातार सक्रिय रहे और कांग्रेस को दोबारा मैदान में लाने का प्रयास किया। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौटी। उस जीत में पायलट की मेहनत को लेकर उनके समर्थक आज भी बड़ा दावा करते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी अशोक गहलोत के पास चली गई।
क्या राजस्थान कांग्रेस में 'पीढ़ी परिवर्तन' का वक्त आ गया है? साल 2018 में पैर पकड़कर सत्ता के शिखर तक पहुंचाने वाले, फिर 2020 की बगावत और 2023 की पार्टी की हार को करीब से देखने वाले सचिन पायलट का राजनीतिक भविष्य क्या है? राष्ट्रीय राजनीति में छत्तीसगढ़ के प्रभारी से लेकर केरल-बंगाल के स्टार प्रचारक तक... दिल्ली से लेकर जयपुर की गलियों में एक ही सवाल गूंज रहा है— क्या 2028 के रण में सचिन पायलट ही होंगे कांग्रेस का चेहरा? आइए देखते हैं आंकड़ों की जुबानी...
पैमाना राजनीतिक ताकत और आंकड़े
टोंक विधानसभा सीट: 2018 में 54,000+ और 2023 में 29,000+ वोटों के अंतर से जीत
कोर वोट बैंक: पूर्वी राजस्थान के गुर्जर-मीणा बहुल क्षेत्रों की लगभग 35-40 सीटों पर सीधा प्रभाव
युवा कनेक्ट: राजस्थान की कुल आबादी में 60% से अधिक युवा हैं, जहां पायलट की रैलियों में भारी भीड़ जुटती है
ट्रैक रिकॉर्ड: 2014-2018 के बीच PCC चीफ रहते हुए कांग्रेस को 21 सीटों से 99 सीटों पर पहुंचाया था

अनुभव-संगठन Vs युवा नेतृत्व
यहीं से शुरू हुआ राजस्थान कांग्रेस का सबसे चर्चित सत्ता संघर्ष। एक तरफ अनुभव और संगठन पर पकड़ रखने वाले अशोक गहलोत थे। दूसरी तरफ युवा नेतृत्व और बदलाव की राजनीति का चेहरा बन चुके सचिन पायलट। यह टकराव धीरे-धीरे इतना बढ़ा कि 2020 में कांग्रेस सरकार पर संकट आ गया। पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए। दिल्ली से लेकर जयपुर तक सियासी हलचल मच गई। हालांकि कांग्रेस आलाकमान ने किसी तरह सरकार बचा ली, लेकिन उस घटना ने यह साफ कर दिया कि राजस्थान कांग्रेस दो शक्ति केंद्रों में बंट चुकी है। इसके बाद भी सचिन पायलट पीछे नहीं हटे। 2023 में उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और पेपर लीक के मुद्दे पर अनशन किया। बेरोजगार युवाओं, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने लगातार आवाज उठाई। यही कारण है कि आज भी राजस्थान में युवाओं के एक बड़े वर्ग के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।
जातीय समीकरण
लेकिन राजनीति केवल लोकप्रियता से नहीं चलती। राजस्थान में जातीय समीकरण चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा आधार रहे हैं। जाट, गुर्जर, राजपूत, दलित, आदिवासी, मुस्लिम और ओबीसी समुदायों का संतुलन साधे बिना कोई भी पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। यही वजह है कि 2028 में कांग्रेस का फैसला केवल इस आधार पर नहीं होगा कि सबसे लोकप्रिय नेता कौन है। पार्टी यह भी देखेगी कि कौन ऐसा चेहरा है जो सभी गुटों को साथ रख सके। कौन ऐसा नेता है जिसके नाम पर संगठन एकजुट रहे। कौन ऐसा चेहरा है जो भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके, यहीं पर तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि अगर कांग्रेस किसी कारण से सचिन पायलट को आधिकारिक मुख्यमंत्री चेहरा नहीं बनाती, तो क्या पायलट की पसंद का कोई नेता आगे लाया जा सकता है?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा समय-समय पर सुनाई देती रही है कि कांग्रेस भविष्य में ऐसा फार्मूला भी अपना सकती है जिसमें संगठन और सरकार की कमान अलग-अलग नेताओं के हाथ में हो। ऐसी स्थिति में पायलट खेमे से आने वाला कोई नेता मुख्यमंत्री पद का चेहरा बन सकता है, जबकि सचिन पायलट चुनावी अभियान के सबसे बड़े स्टार प्रचारक और रणनीतिक केंद्र बने रहे। यानी 2028 का चुनाव केवल "सचिन पायलट बनाम कोई और" नहीं हो सकता। यह "पायलट मॉडल" बनाम "पारंपरिक कांग्रेस मॉडल" की लड़ाई भी बन सकता है। इस बीच कांग्रेस में गोविंद सिंह डोटासरा जैसे नेताओं की संगठन पर मजबूत पकड़ है। टीकाराम जूली का प्रभाव बढ़ रहा है। कई युवा विधायक भी भविष्य के नेतृत्व की कतार में खड़े दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह पुराने और नए नेतृत्व के बीच संतुलन कैसे बनाए।
"राजनीतिक जानकारों की नजर एक और पहलू पर टिकी हुई है। कांग्रेस आलाकमान पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में ऐसे प्रयोग कर चुका है, जहां चुनाव किसी एक चेहरे पर नहीं बल्कि सामूहिक नेतृत्व के नाम पर लड़ा गया। राजस्थान में भी ऐसा मॉडल अपनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में सचिन पायलट को चुनाव अभियान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है, जबकि मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा चुनाव के बाद के लिए छोड़ दी जाए। लेकिन अगर ऐसा होता है, तब भी यह देखना दिलचस्प होगा कि विधायक दल की बैठक में सबसे प्रभावशाली आवाज किसकी होगी। क्या उस समय पायलट अपने समर्थक विधायकों की ताकत के दम पर मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाएंगे, या फिर उनकी पसंद का कोई ऐसा नेता सामने आएगा जो सभी गुटों को स्वीकार्य हो? यही वह राजनीतिक पहेली है, जिसका जवाब शायद 2028 का चुनाव ही देगा।"
यदि कांग्रेस आलाकमान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी पूरी तरह 'न्यू जनरेशन शिफ्ट' का फैसला करता है, तो पायलट को चुनाव से पहले फ्री-हैंड दिया जा सकता है..... ऐसे में एंटी-इंकंबेंसी का मुकाबला करने के लिए पायलट कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा होंगे. यदि डोटासरा (जाट चेहरा), टीकाराम जूली (दलित चेहरा) और पायलट (गुर्जर/युवा चेहरा) को एक साथ मैदान में उतारा जाता है, तो पायलट मुख्य कैंपेनर होंगे।
सचिन पायलट के लिए 2028 का रास्ता इतना आसान भी नहीं है....... उनके भविष्य को तय करने वाले तीन सबसे बड़े फैक्टर्स इस वक्त काम कर रहे हैं)
पहला- गुटबाजी और आंतरिक कमान
अशोक गहलोत की सीनियरिटी और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बढ़ते कद के बीच पायलट को खुद को 'सर्वमान्य नेता' के रूप में स्थापित करना होगा..... हाल ही में पीसीसी के सोशल मीडिया हैंडल से उनकी तस्वीरें गायब होने जैसी घटनाओं ने अंदरूनी खींचतान को हवा दे दी है...
दूसरा- जातीय संतुलन (Social Engineering)
पायलट केवल गुर्जर नेता की छवि में सिमटना नहीं चाहते...... उन्हें जाट, दलित, मीणा और मुस्लिम वोटों का एक नया 'सोशल कॉम्बिनेशन' तैयार करना होगा.....
तीसरा- हाईकमान का भरोसा
छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी संभाल रहे पायलट को दिल्ली में राहुल और प्रियंका गांधी का करीबी माना जाता है, लेकिन क्या हाईकमान उन्हें 2028 में सीएम फेस घोषित करने का जोखिम उठाएगा?
सवाल यह भी है कि अशोक गहलोत सक्रिय राजनीति में कितनी भूमिका निभाते हैं। क्या गहलोत और पायलट के रिश्तों में आने वाले वर्षों में नई राजनीतिक समझ बनती है? क्या कांग्रेस हाईकमान राजस्थान में किसी एक चेहरे पर दांव लगाएगा या सामूहिक नेतृत्व का रास्ता चुनेगा? इन सभी सवालों का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि 2028 का विधानसभा चुनाव राजस्थान कांग्रेस के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगा। यह उस नेता का फैसला भी करेगा जो अगले एक दशक तक राजस्थान कांग्रेस की दिशा तय करेगा। और चाहे मुख्यमंत्री पद का चेहरा सचिन पायलट हो... उनकी पसंद का कोई नेता हो या फिर अशोक गहलोत।।
राजस्थान की राजनीति का मिजाज 'राज बदलने' का रहा है. बीजेपी के पास जहां भजनलाल शर्मा की नई टीम है, वहीं कांग्रेस के भीतर की सुगबुगाहट बता रही है कि 2028 की बिसात अभी से बिछने लगी है. सचिन पायलट के पास उम्र का फायदा, युवाओं का क्रेज और क्रेडिबिलिटी भी है. लेकिन क्या वो समय रहते कांग्रेस के 'पायलट' बन पाएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
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JP Sharma 
