आजादी छीनना प्रशासनिक लापरवाही नहीं, संवैधानिक उल्लंघन: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर निवासी घमंडनाथ को रिहाई आदेश के बावजूद 53 दिन तक जेल में रखने के मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने 2 लाख रुपये मुआवजा देने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए।

आजादी छीनना प्रशासनिक लापरवाही नहीं, संवैधानिक उल्लंघन: राजस्थान हाईकोर्ट
Rajasthan Highcourt

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद तल्ख और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी नागरिक को कानूनी रूप से रिहाई का हक मिलने के बाद भी हिरासत में रखना महज एक ‘प्रशासनिक गलती’ नहीं, बल्कि देश के संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। हाई कोर्ट के जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने नागौर जिले के इस मामले में राजस्थान सरकार की प्रशासनिक लचरता को कड़ी फटकार लगाई है और पीड़ित को 2 लाख रुपये का मुआवजा (जुर्माना) देने का आदेश जारी किया है। 

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, नागौर निवासी घमंडनाथ को सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण के आरोपों के चलते ‘सिविल कारावास’ की सजा सुनाई गई थी। इस सजा के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने अजमेर के अतिरिक्त संभागीय आयुक्त (एडिशनल डिविजनल कमिश्नर) की अदालत में अपील दायर की थी। मामले के तथ्यों को देखते हुए अपीलीय प्राधिकारी ने 15 अप्रैल 2026 को ही सजा के आदेश को स्थगित करते हुए घमंडनाथ की तत्काल रिहाई का आदेश जारी कर दिया था। 

अधिकारियों की लापरवाही: 53 दिनों तक कटी अवैध जेल -

सक्षम प्राधिकारी द्वारा रिहाई का स्पष्ट आदेश जारी होने के बावजूद जेल और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। आदेश की तामील न होने के कारण पीड़ित घमंडनाथ को पूरे 53 दिनों तक अवैध रूप से सलाखों के पीछे रहना पड़ा। थक-हारकर पीड़ित की पत्नी ने अपने पति की स्वतंत्रता के लिए राजस्थान हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। हाई कोर्ट के कड़े हस्तक्षेप के बाद आखिरकार 8 जून 2026 को पीड़ित को जेल से रिहा किया जा सका। 

मानवीय दृष्टिकोण: गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है परिवार -

मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब पीड़ित के वकील मोतीसिंह राजपुरोहित ने अदालत को परिवार की दयनीय स्थिति से अवगत कराया। सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर आया कि पीड़ित घमंडनाथ स्वयं एचआईवी से पीड़ित हैं, जबकि उनकी पत्नी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जंग लड़ रही हैं। अदालत ने इस पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे नाजुक दौर में प्रशासन की इस अवैध लापरवाही ने पीड़ित और उसके परिवार को असहनीय मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न का शिकार बनाया है। 

एक नज़र में मामला -

• पीड़ित: घमंडनाथ (नागौर जिला)

• रिहाई का आदेश: 15 अप्रैल 2026 (अतिरिक्त संभागीय आयुक्त, अजमेर)

• कुल अवैध हिरासत: 53 दिन 

• वास्तविक रिहाई तिथि: 8 जून 2026 (हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद)

• कोर्ट की पेनल्टी: 2,00,000 मुआवजा (45 दिन के भीतर देय)

अदालत की तल्ख टिप्पणियां और सख्त निर्देश -

हाई कोर्ट ने इस मामले को देश के हर नागरिक के मूल अधिकारों से जोड़ते हुए राज्य सरकार को निम्नलिखित कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

कानूनी दायित्व का उल्लंघन: कोर्ट ने साफ कहा कि किसी उच्च प्राधिकारी के आदेश का पालन करना किसी प्रशासनिक अधिकारी का 'विवेक' या इच्छा नहीं, बल्कि उसका अनिवार्य 'कानूनी दायित्व' है। शुरुआती हिरासत भले ही वैध हो, लेकिन स्टे मिलने के बाद एक सेकंड भी जेल में रखना पूरी तरह गैर-कानूनी है। 

45 दिन में मुआवजा भुगतान: अदालत ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया है कि वह 45 दिनों के भीतर पीड़ित घमंडनाथ को 2 लाख रुपये की मुआवजा राशि का भुगतान सुनिश्चित करे।

दोषी अफसरों से होगी वसूली: खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस पूरे घटनाक्रम की आंतरिक जांच करने और आदेश दबाकर बैठने वाले दोषी अधिकारियों व जेल कर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी विकल्प दिया है कि सरकार मुआवजे की यह राशि दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।