.. यह है एशिया का सबसे अमीर गांव, सालाना 175 करोड़ का टर्नओवर! मनोहरसिंह खोखर

हिमाचल प्रदेश का मड़ावग गांव सेब की खेती के दम पर एशिया के सबसे अमीर गांवों में शामिल हो गया है। यहां हर परिवार की सालाना आय 35 से 80 लाख रुपये तक है और गांव सालाना 175 करोड़ रुपये तक के सेब का कारोबार करता है।

.. यह है एशिया का सबसे अमीर गांव, सालाना 175 करोड़ का टर्नओवर! मनोहरसिंह खोखर

बिना किसी बड़े उद्योगपति या नामी कंपनी के बड़े अधिकारियों के हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा पहाड़ी गांव आज पूरे एशिया के लिए मिसाल बन चुका है। शिमला जिले की चौपाल तहसील में समुद्र तल से 8300 फीट की ऊंचाई पर स्थित मड़ावग गांव प्रति व्यक्ति आय के मामले में एशिया का सबसे अमीर गांव बनकर उभरा है। यहां न तो कोई नौकरी की तलाश में शहर जाता है और न ही कोई बेरोजगार है, क्योंकि यहां की मिट्टी अब लाल सोना यानी 'सेब' उगल रही है। यहां हर परिवार की सालाना आमदनी 35 से 80 लाख रु. है। यह सेब के बागानों में झोंकी गई मेहनत का नतीजा है।  

आलीशान जिंदगी और करोड़पति किसान -

मड़ावग गांव में लगभग 225 से 230 परिवार रहते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस गांव का हर परिवार करोड़पति है। यहां प्रति परिवार की औसत वार्षिक आय 35 लाख से 80 लाख के बीच है, जो फसल और बाजार के भाव पर निर्भर करती है। कुछ बड़े बागवानों की आय इससे भी कहीं अधिक है।

बैंक बैलेंस और जीवन स्तर - 

स्थानीय बैंकों में यहां के ग्रामीणों की करोड़ों रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जमा है। गांव की संकरी पहाड़ी सड़कों पर महंगी लग्जरी गाड़ियां और आलीशान कोठियां (लग्जरी मकान) शहरों को मात देती नजर आती हैं।

सालाना 175 करोड़ का सेब साम्राज्य -

मड़ावग की इस ऐतिहासिक समृद्धि के पीछे ग्रामीणों की हाड़-तोड़ मेहनत और आधुनिक बागवानी है। यह गांव हर साल औसतन 150 करोड़ से 175 करोड़ रुपये का सेब देश-विदेश की मंडियों में बेचता है। यहां रॉयल एप्पल, रेड गोल्ड और गेल गाला जैसी प्रीमियम क्वालिटी के सेब उगाए जाते हैं। अनुकूल ऊंचाई (8,300 फीट) के कारण यहां के सेब का आकार, रंग और शेल्फ-लाइफ (जल्दी खराब न होने का गुण) बेहद शानदार होता है। मड़ावग और इसके साथ लगते दशोली क्षेत्र का सेब दिल्ली, मुंबई सहित अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कश्मीर और किन्नौर के सेब को पछाड़ते हुए ऊंचे दामों पर हाथों-हाथ बिकता है।

आलू की खेती से हाईटेक बागवानी का सफर -

80 के दशक तक मड़ावग में सेब का नामोनिशान नहीं थां, यहां के लोग पारंपरिक रूप से सिर्फ आलू और मटर उगाते थे। गांव के दूरदर्शी किसान चइयां राम मेहता ने पहली बार सेब का बाग लगाया और अन्य ग्रामीणों को प्रेरित किया। नब्बे के दशक में आधुनिक पौधों के आने के बाद गांव ने पूरी तरह बागवानी को अपना लिया। आज गांव की नई पीढ़ी इंटरनेट के जरिए वैश्विक बाजारों के भाव ट्रैक करती है। ओलावृष्टि और बर्फबारी से करोड़ों की फसल को बचाने के लिए पूरे बगीचों में महंगे एंटी-हेल नेट लगाए जाते हैं और हाई-डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।