जगन्नाथ पहाड़िया पहले और आखिरी दलित मुख्यमंत्री... फिर एक विवाद से गई कुर्सी
राजस्थान के पहले और अब तक के आखिरी दलित मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया की पूरी राजनीतिक कहानी पढ़ें। जानिए कैसे 25 साल की उम्र में सांसद बने, मुख्यमंत्री बने और क्यों सिर्फ 13 महीने में उनकी सरकार चली गई।
राजस्थान के पहले और अब तक के आखिरी दलित मुख्यमंत्री की पूरी राजनीतिक कहानी
राजस्थान की राजनीति में कई मुख्यमंत्री आए और गए, लेकिन एक नाम ऐसा है जो इतिहास में हमेशा अलग पहचान के साथ दर्ज रहेगा—जगन्नाथ पहाड़िया।
भरतपुर जिले के भुसावर कस्बे के एक साधारण दलित (खटीक) परिवार से निकलकर उन्होंने देश की राजनीति में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी उस दौर में कल्पना करना भी मुश्किल था। 25 वर्ष की उम्र में सांसद बनने से लेकर इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और फिर राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री बनने तक उनकी यात्रा किसी राजनीतिक फिल्म की पटकथा जैसी लगती है।
लेकिन सत्ता का यह सफर लंबा नहीं चला। मुख्यमंत्री बनने के महज 13 महीने बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। उनकी विदाई के पीछे प्रशासनिक कारण, कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति, गुटबाजी और एक साहित्यिक विवाद—सबकी चर्चा आज भी होती है। पूरा वीडियो देखिए:::
पहला बड़ा मोड़: नेहरू से मुलाकात और राजनीति की शुरुआत
1957 का लोकसभा चुनाव था।
भरतपुर के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मास्टर आदित्येंद्र ने युवा जगन्नाथ पहाड़िया की मुलाकात प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कराई। कांग्रेस उस समय शिक्षित दलित नेतृत्व को आगे लाना चाहती थी।
नेहरू उनसे प्रभावित हुए और उन्हें सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से टिकट मिल गया।
महज 25 साल 2 महीने की उम्र में वे चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे और उस समय देश के सबसे युवा सांसदों में शामिल हो गए।
यहीं से उनकी राष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत हुई।
इंदिरा गांधी के भरोसेमंद नेता
जगन्नाथ पहाड़िया ने केवल सांसद की भूमिका ही नहीं निभाई, बल्कि केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय भी संभाले।
उन्होंने वित्त, उद्योग, श्रम और कृषि जैसे विभागों में जिम्मेदारी निभाई। कांग्रेस नेतृत्व में उन्हें संगठन और सरकार दोनों में भरोसेमंद नेता माना जाता था।
उनका राजनीतिक जीवन ऐसा रहा कि उन्होंने नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और बाद में राहुल गांधी तक कांग्रेस के अलग-अलग दौर देखे।
जब कांग्रेस ने खेला सबसे बड़ा सामाजिक दांव
1980 में कांग्रेस ने राजस्थान में ऐतिहासिक फैसला लिया।
राजस्थान जैसे सामंती सामाजिक ढांचे वाले राज्य में पहली बार किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया।
6 जून 1980 को जगन्नाथ पहाड़िया ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस उत्तर भारत में दलित नेतृत्व को मजबूत करना चाहती थी और पहाड़िया उसका प्रमुख चेहरा बनाए गए।
शराबबंदी का साहसिक फैसला
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका सबसे चर्चित निर्णय पूरे राजस्थान में शराबबंदी लागू करना था।
उस समय इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना गया।
हालांकि राजस्व में भारी कमी, अवैध शराब की समस्या और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण यह प्रयोग अधिक समय तक नहीं चल पाया।
क्या महादेवी वर्मा वाली टिप्पणी बनी आखिरी वजह?
10 जनवरी 1981।
जयपुर के रविन्द्र मंच पर कार्यक्रम था।
मुख्य अतिथि थीं हिंदी की महान कवयित्री महादेवी वर्मा और अध्यक्ष थे मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया।
अपने संबोधन में पहाड़िया ने कहा कि महादेवी वर्मा की कविताएं उन्हें समझ में नहीं आतीं और साहित्य ऐसा होना चाहिए जिसे आम आदमी आसानी से समझ सके।
यह बयान साहित्यिक जगत में विवाद का कारण बना।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस समय कांग्रेस के भीतर पहले से नेतृत्व परिवर्तन की मांग चल रही थी। ऐसे में यह विवाद उनके विरोधियों के लिए एक अतिरिक्त हथियार बन गया।
इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि केवल इसी टिप्पणी के कारण उनकी कुर्सी गई, लेकिन यह घटनाक्रम सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज करने वाला जरूर माना जाता है।
दलित राजनीति का अधूरा सपना
मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे राजस्थान में दलित राजनीति का स्थायी आधार तैयार नहीं कर पाए।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार वे दलित समाज की विभिन्न जातियों को एकजुट करने में सफल नहीं रहे।
यही वजह रही कि उनके बाद आज तक राजस्थान में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं बन सका।
हार का लंबा दौर
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार घटता गया।
वे कई चुनाव लगातार हारते रहे।
1999 का लोकसभा चुनाव भी हार गए।
हालांकि 2003 में उन्होंने भुसावर विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर वापसी की।
कांग्रेस ने राज्यपाल बनाकर दिया सम्मान
सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पहले बिहार और फिर हरियाणा का राज्यपाल बनाया।
इसे उनके लंबे राजनीतिक योगदान के सम्मान के रूप में देखा गया।
19 मई 2021 को हुआ निधन
हरियाणा के गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में 19 मई 2021 को उनका निधन हो गया।
लेकिन राजस्थान की राजनीति में उनका नाम हमेशा पहले दलित मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज रहेगा।
FACT FILE
नाम: जगन्नाथ पहाड़िया
जन्म: 15 जनवरी 1932, भुसावर (भरतपुर)
जाति: खटीक (अनुसूचित जाति)
शिक्षा: एमए, एलएलबी
पहला चुनाव: 1957
पहली जीत: सवाई माधोपुर लोकसभा
लोकसभा सदस्य: 1957, 1967, 1971, 1980
विधायक: 1980, 1985, 2003 सहित चार बार
मुख्यमंत्री: 6 जून 1980 – 13 जुलाई 1981
राज्यपाल: बिहार और हरियाणा
निधन: 19 मई 2021
टाइमलाइन
1957 – पहली बार सांसद
1967 – दूसरी बार सांसद
1971 – तीसरी बार सांसद
1980 – चौथी बार सांसद और बाद में मुख्यमंत्री
1981 – मुख्यमंत्री पद से विदाई
1985 – विधायक
1998 – मुख्यमंत्री पद की दौड़ में वरिष्ठ नेता, लेकिन अशोक गहलोत चुने गए
2003 – भुसावर से विधायक बने
2009 – हरियाणा के राज्यपाल बने
2021 – निधन
10 बड़ी बातें
- राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री।
- अब तक के आखिरी दलित मुख्यमंत्री।
- 25 वर्ष की उम्र में सांसद।
- चार बार सांसद।
- चार बार विधायक।
- इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री।
- पूरे प्रदेश में शराबबंदी लागू करने वाले मुख्यमंत्री।
- बिहार और हरियाणा के राज्यपाल रहे।
- कांग्रेस की पांच पीढ़ियों के साथ काम किया।
- सादगी और गांधीवादी जीवनशैली के लिए जाने गए।
अनसुने किस्से
1. नेहरू से मुलाकात ने बदल दी किस्मत
एक मुलाकात ने उन्हें संसद तक पहुंचा दिया।
2. सबसे कम उम्र के सांसदों में नाम
25 साल की उम्र में संसद पहुंचे।
3. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी साधारण जीवन
सरकारी तामझाम से दूरी बनाए रखते थे।
4. शराबबंदी का सबसे बड़ा प्रयोग
आज भी उनके इस फैसले की चर्चा होती है।
5. आज तक नहीं मिला दूसरा दलित मुख्यमंत्री
चार दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी राजस्थान में कोई दूसरा दलित मुख्यमंत्री नहीं बन पाया।

