अब OTP के बाद ही मिलेंगे सेनेटरी नैपकिन! धांधली रोकने के चक्कर में बढ़ी बेटियों की परेशानी!
मुख्यमंत्री कालीबाई भील उड़ान योजना में अब सेनेटरी नैपकिन वितरण के लिए OTP सत्यापन अनिवार्य होगा। नई डिजिटल व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन कई किशोरियों और महिलाओं के सामने नई चुनौती भी खड़ी हो सकती है।
राजस्थान सरकार ने मुख्यमंत्री कालीबाई भील उड़ान योजना में पारदर्शिता बढ़ाने और फर्जी लाभार्थियों पर रोक लगाने के लिए नई डिजिटल व्यवस्था लागू कर दी है। सरकार का मकसद योजना में होने वाली धांधलियों को खत्म करना है, लेकिन इस नए सिस्टम ने हजारों किशोरियों और महिलाओं के सामने एक नई व्यावहारिक परेशानी भी खड़ी कर दी है।
अब योजना के तहत सेनेटरी नैपकिन लेने से पहले लाभार्थी का पंजीयन राजसीम्स (RajSIMS) पोर्टल पर किया जाएगा। इतना ही नहीं, जनआधार कार्ड से जुड़े मोबाइल नंबर पर आने वाले वन टाइम पासवर्ड (OTP) का सत्यापन भी अनिवार्य होगा। यानी अब सेनेटरी नैपकिन का वितरण केवल OTP सत्यापन के बाद ही संभव होगा।
सरकार का दावा है कि इस डिजिटल व्यवस्था से फर्जी लाभार्थियों की पहचान होगी और पंजीयन से लेकर नैपकिन की मांग, सप्लाई और वितरण तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन दर्ज रहेगी। किस लाभार्थी को कब, कहां और कितने पैकेट दिए गए, इसकी पूरी जानकारी सिस्टम में उपलब्ध रहेगी। इससे रिकॉर्ड में गड़बड़ी और फर्जी वितरण जैसी शिकायतों पर काफी हद तक रोक लगने की उम्मीद जताई जा रही है।
लेकिन इस व्यवस्था का दूसरा पहलू भी है, जो सीधे उन किशोरियों और महिलाओं से जुड़ा है जिनके जनआधार में उनका अपना मोबाइल नंबर लिंक नहीं है। प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे जनआधार कार्ड हैं, जिनमें पिता, भाई, पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य का मोबाइल नंबर दर्ज है। ऐसे में जब भी कोई किशोरी स्कूल या आंगनबाड़ी केंद्र पर सेनेटरी नैपकिन लेने पहुंचेगी, उसे पहले परिवार के उस सदस्य से OTP मंगवाना पड़ेगा, जिसके नंबर पर संदेश जाएगा।

यहीं से कई सवाल खड़े होने लगे हैं। जिस योजना का उद्देश्य किशोरियों को बिना किसी झिझक के मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना है, क्या उसमें हर बार किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना उचित होगा? अगर परिवार का सदस्य उस समय उपलब्ध न हो, फोन बंद हो या नेटवर्क की समस्या हो, तो क्या लाभार्थी सिर्फ एक OTP की वजह से योजना का लाभ नहीं ले पाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि मासिक धर्म पहले से ही समाज में एक संवेदनशील विषय है। ऐसे में हर बार पिता, भाई या किसी अन्य पुरुष सदस्य से OTP मांगना कई किशोरियों के लिए संकोच और असहजता की स्थिति पैदा कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आज भी कई लड़कियों के पास अपना मोबाइल फोन नहीं है, वहां यह समस्या और अधिक गंभीर हो सकती है।
योजना के तहत लाभार्थियों को हर तीन महीने में छह पैकेट सेनेटरी नैपकिन दिए जाते हैं। यानी प्रति माह दो पैकेट के हिसाब से एक बार में कुल 36 सेनेटरी पैड्स उपलब्ध कराए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले लगभग एक वर्ष से इस योजना के तहत सेनेटरी नैपकिन की सप्लाई बंद थी। अब सरकार ने दोबारा सप्लाई शुरू करने के साथ पूरी वितरण प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है।
डिजिटल मॉनिटरिंग और पारदर्शिता निश्चित रूप से अच्छी पहल है और इससे सरकारी योजनाओं में जवाबदेही भी बढ़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या तकनीक के नाम पर ऐसी प्रक्रिया लागू कर दी गई है, जो सबसे ज्यादा जरूरतमंद किशोरियों के लिए ही नई मुश्किल बन जाए? धांधली रोकने की कोशिश अपनी जगह सही है, लेकिन अगर एक किशोरी को सेनेटरी नैपकिन लेने के लिए पहले घर फोन कर OTP मांगना पड़े, तो यह व्यवस्था सुविधा कम और औपचारिकता ज्यादा लग सकती है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार उन लाभार्थियों के लिए कोई वैकल्पिक सत्यापन व्यवस्था लाती है या नहीं, जिनके जनआधार में स्वयं का मोबाइल नंबर दर्ज नहीं है। क्योंकि योजना का असली उद्देश्य केवल रिकॉर्ड को डिजिटल बनाना नहीं, बल्कि जरूरतमंद किशोरियों और महिलाओं तक सम्मानपूर्वक और बिना किसी अतिरिक्त बाधा के सेनेटरी नैपकिन पहुंचाना भी है।

