एक ऐसा प्रण… 388 दिनों की नंगे पैर 'तपस्या, आखिर दिलाई बालोतरा को जिले की सौगात
बालोतरा को जिला बनाने के लिए 388 दिन तक नंगे पैर रहने वाले पूर्व विधायक मदन प्रजापत की संघर्ष गाथा। जानिए कैसे उन्होंने जनता की 40 साल पुरानी मांग पूरी कराई, सीएम की डिनर पार्टी तक ठुकराई और आज भी बालोतरा के 'भागीरथ' कहलाते हैं।
राजस्थान की राजनीति में कई नेता अपने बयानों और सियासी दांव-पेंच के लिए जाने जाते हैं, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर-बालोतरा क्षेत्र में एक ऐसा राजनेता भी है जिसकी पहचान जनता के प्रति कड़े संकल्प और उग्र जनसंघर्ष से जुड़ी है। हम बात कर रहे हैं पचपदरा विधानसभा सीट से दो बार कांग्रेस के विधायक रहे मदन प्रजापत की। क्षेत्र के लोग उन्हें विकास पुरुष से ज़्यादा एक ऐसे 'जिद्दी जननायक' के रूप में देखते हैं, जिन्होंने जनता की 40 साल पुरानी मांग को मनवाने के लिए खुद को बेहद कड़े इम्तिहान में झोंक दिया। पूर्व विधायक मदन प्रजापत की कहानी एक राजनेता के अनोखे और कड़े संकल्प की दास्तां है। उन्हें राजनीति में उनके विकास कार्यों से ज़्यादा "बालोतरा को जिला बनाने के लिए नंगे पैर रहने के ऐतिहासिक प्रण" के लिए जाना जाता है। मदन प्रजापत की यह कहानी दर्शाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि किसी जनप्रतिनिधि के भीतर अपनी जनता की मांग को लेकर सच्ची जिद और जनभावनाओं के प्रति समर्पण हो, तो वह सरकार को भी झुकने पर मजबूर कर सकता है। उनका यह सफरनामा राजस्थान की सियासत के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
388 दिनों की नंगे पैर 'तपस्या', जब ठुकरा दी थी सीएम की डिनर पार्टी -
मदन प्रजापत की कहानी का सबसे स्वर्णिम अध्याय 23 फरवरी 2022 को राजस्थान विधानसभा के गेट नंबर 5 के बाहर से शुरू हुआ। राज्य सरकार के बजट में जब बालोतरा को जिला बनाने की घोषणा नहीं हुई, तो प्रजापत ने वहीं अपने जूते-चप्पल त्याग दिए। उन्होंने प्रण लिया कि जब तक बालोतरा को जिला नहीं बनाया जाता, वे पैर में कुछ नहीं पहनेंगे। इसके बाद शुरू हुआ 388 दिनों का एक बेहद कठिन सफर। थार मरुस्थल की चुभती हुई 48 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी हो, हाड़ कंपाने वाली सर्दी या फिर बरसात की सड़कों की कीचड़। मदन प्रजापत हर जगह नंगे पैर ही जनता के बीच नजर आए। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी उन्होंने राजस्थान में सैंकड़ों किलोमीटर का सफर नंगे पांव ही तय किया। इस दौरान एक दिलचस्प वाकया भी हुआ। जयपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की एक डिनर पार्टी के दौरान कुछ अन्य विधायकों ने मदन प्रजापत से कहा कि आज सीएम खुद अपने हाथों से उन्हें जूते पहनाएंगे। प्रजापत को डर था कि कहीं उनकी प्रतिज्ञा अधूरी न रह जाए, इसलिए वे बिना भोजन किए ही उस पार्टी से चुपचाप हाथ जोड़कर बाहर निकल आए। आखिरकार 17 मार्च 2023 को उनकी यह 'तपस्या' रंग लाई और सरकार को बालोतरा को नए जिले के रूप में घोषित करना पड़ा। इसके बाद उनके समर्थकों ने 750 ग्राम चांदी की जूतियां बनवाईं, जिसे मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उन्हें पहनाकर उनका संकल्प पूरा कराया गया।

जनता के हक के लिए गए जेल, बालोतरा में हुआ था भारी बवाल -
मदन प्रजापत की कहानी सिर्फ नंगे पैर चलने के अहिंसक संकल्प तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनका राजनीतिक जीवन उग्र आंदोलनों और जेल यात्रा का भी गवाह रहा है। साल 2016 का 'रीको थप्पड़ कांड' उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ था। जून 2016 में बालोतरा के औद्योगिक क्षेत्र में राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम (RIICO) द्वारा बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही थी। पूर्व विधायक मदन प्रजापत ने मौके पर पहुंचकर इस कार्रवाई को गरीब विरोधी और भेदभावपूर्ण बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसी दौरान अधिकारियों के साथ उनकी तीखी बहस हो गई और रीको के क्षेत्रीय प्रबंधक (RM) प्रवीन गुप्ता को थप्पड़ मारने का आरोप मदन प्रजापत पर लगा। पुलिस ने जब उन्हें रेलवे फाटक के पास से धरने के दौरान गिरफ्तार किया, तो पूरे बालोतरा में भारी बवाल मच गया। उग्र समर्थकों और पुलिस के बीच लाठी-भाटा जंग हुई, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए और गाड़ियों में आगजनी तक की गई। इस मामले में मदन प्रजापत को जमानत नहीं मिली और उन्हें करीब एक महीने तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। हालांकि, बाद में बालोतरा की एसीजेएम कोर्ट ने ठोस सबूतों के अभाव में उन्हें और उनके समर्थकों को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया।
राजनीतिक उतार-चढ़ाव का दौर -
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर मदन प्रजापत ने पचपदरा विधानसभा सीट से दो बार चुनाव जीता। विधानसभा में वे हमेशा मुखर रहे। चाहे स्थानीय रिफाइनरी में स्थानीय युवाओं को रोजगार का मुद्दा हो या फिर अपराधियों के खिलाफ मोर्चा खोलना, वे लगातार जनता के बीच बने रहे। हालांकि, साल 2023 के विधानसभा चुनाव में वे अपनी सीट नहीं बचा पाए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन चुनावी हार के बावजूद बालोतरा को जिला मुख्यालय का दर्जा दिलाने वाले 'नायक' के रूप में क्षेत्र के लोग आज भी उनका उतना ही सम्मान करते हैं।
हार तात्कालिक, प्रभाव दूरगामी -
पश्चिमी राजस्थान की सियासत में हार-जीत के आंकड़े अक्सर बदलते रहते हैं, लेकिन जनता के दिलों पर छोड़ी गई छाप अमिट होती है। पचपदरा विधानसभा सीट से पूर्व विधायक मदन प्रजापत की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। 23 फरवरी 2022 को राजस्थान विधानसभा के गेट नंबर 5 के बाहर अपने जूते-चप्पल त्यागने वाले मदन प्रजापत ने 388 दिनों तक थार की झुलसाती धूप और कड़कड़ाती ठंड में नंगे पैर रहकर बालोतरा को जिला तो दिलवा दिया, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। हालांकि, चुनावी हार के ढाई साल बाद आज जब बालोतरा एक स्वतंत्र जिले के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुका है, तब यहां की जनता की राय और इस संघर्ष के दूरगामी राजनीतिक प्रभाव एक नई कहानी बयां कर रहे हैं।
जनता की मौजूदा राय: कुर्सी भले गई, पर हमारे दिलों के भागीरथ -
बालोतरा जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आज भी मदन प्रजापत के इस त्याग को लेकर गहरी कृतज्ञता का भाव है। स्थानीय व्यापारियों, युवाओं और बुजुर्गों का मानना है कि बालोतरा को जिला बनवाना किसी बड़े सपने के सच होने जैसा था। कलेक्ट्रेट, जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय और अन्य जिला स्तरीय सुविधाओं का लाभ उठा रही जनता आज खुलकर कहती है, "चुनाव में समीकरण अलग होते हैं, जातिगत गणित और एंटी-इन्कम्बेंसी की वजह से मदन जी चुनाव हार गए, लेकिन बालोतरा के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में रहेगा। पैर के छालों की कीमत वोटों से नहीं आंकी जा सकती।" जनता उन्हें आज भी बालोतरा का 'भागीरथ' मानती है।
'अंडरकरेंट' जो बदल सकता है भविष्य का समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मदन प्रजापत की यह हार तात्कालिक थी, लेकिन इस संघर्ष के दूरगामी प्रभाव बहुत गहरे हैं। भले ही मदन प्रजापत आज विधानसभा में नहीं हैं, लेकिन बाड़मेर-बालोतरा और पूरे पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में उनका कद अपनी पार्टी (कांग्रेस) के कई मौजूदा विधायकों से कहीं अधिक बड़ा हो चुका है। पिछले चुनावों में जो कसर रह गई थी, वह अब धीरे-धीरे जनता के भीतर एक 'अंडरकरेंट' (अंतःप्रवाह) के रूप में बदल रही है। क्षेत्र के लोगों में एक टीस है कि जिला पाने के बाद भी उन्होंने उस नेता को हरा दिया जिसने अपनी देह को कष्ट दिया। यह सहानुभूति भविष्य के चुनावों में कांग्रेस के लिए एक मजबूत ढाल और मदन प्रजापत के लिए 'ब्याज समेत' सियासी लाभ का जरिया बन सकती है। बालोतरा जिला बनने का पूरा श्रेय आज भी मदन प्रजापत के खाते में ही जाता है। ऐसे में आगामी राजनीतिक दौरों, स्थानीय निकाय चुनावों या भविष्य के विधानसभा चुनावों में इस मुद्दे की गूंज कम नहीं होने वाली। भाजपा के लिए भी इस क्षेत्र में मदन प्रजापत के इस 'इमोशनल कार्ड' और जनता के जुड़ाव की काट ढूंढना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
Saloni Kushwaha 
