बजट 2026 में चाबहार पोर्ट को झटका: भारत ने ईरान की रणनीतिक परियोजना से क्यों खींचे हाथ?
केंद्रीय बजट 2026-27 में ईरान के चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया गया है। इससे पहले भारत ने इस रणनीतिक बंदरगाह को किस तरह समर्थन दिया था और इस बदलाव के पीछे भू-राजनीतिक व अमेरिकी प्रतिबंधों का क्या प्रभाव है — पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
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बजट 2026 में चाबहार पोर्ट को झटका: भारत ने ईरान की रणनीतिक परियोजना से क्यों खींचे हाथ?
नई दिल्ली।
केंद्रीय बजट 2026-27 में एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सामने आया है। भारत सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए किसी भी प्रकार का वित्तीय आवंटन नहीं किया है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब यह परियोजना भारत की विदेश नीति, व्यापारिक कनेक्टिविटी और मध्य एशिया तक पहुंच की रणनीति का अहम हिस्सा मानी जाती रही है।
बजट दस्तावेजों के अनुसार, चाबहार पोर्ट के लिए आवंटन शून्य (Zero Allocation) कर दिया गया है, जबकि पिछले वर्षों में भारत इस परियोजना पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करता रहा है।
क्या है चाबहार पोर्ट और क्यों है भारत के लिए अहम?

ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सिर्फ एक पोर्ट नहीं, बल्कि रणनीतिक भू-राजनीतिक प्रवेश द्वार है।
इस बंदरगाह के जरिए भारत
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पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान तक पहुंच बना सकता है
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मध्य एशिया और रूस से व्यापार बढ़ा सकता है
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International North-South Transport Corridor (INSTC) को मजबूती दे सकता है
2016 में भारत और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद भारत ने इस पोर्ट के विकास और संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
पहले कितना पैसा देता था भारत?
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2024-25 में चाबहार परियोजना पर लगभग ₹400 करोड़ खर्च किए गए
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2025-26 के बजट में पहले ₹100 करोड़ रखे गए, जिसे बाद में संशोधित कर ₹400 करोड़ किया गया
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लेकिन 2026-27 में यह राशि पूरी तरह समाप्त कर दी गई
यानी यह कोई तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि नीतिगत (Policy Decision) माना जा रहा है।

अचानक फंड क्यों रोका गया? असली वजह क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं—
अमेरिका के नए प्रतिबंध
अमेरिका ने हाल ही में ईरान के खिलाफ कड़े आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लागू किए हैं।
यह साफ कर दिया गया है कि जो भी देश ईरान के साथ सक्रिय व्यापार करेगा, उस पर 25% तक अतिरिक्त टैक्स और सेकेंडरी सैंक्शन लग सकते हैं।
हालांकि चाबहार को पहले प्रतिबंधों से छूट मिली थी, लेकिन अब वह छूट कमजोर होती नजर आ रही है।
भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी
भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, टेक्नोलॉजी और इंडो-पैसिफिक रणनीति में काफी मजबूत हुए हैं।
ऐसे में भारत ऐसे किसी प्रोजेक्ट से दूरी बना सकता है जो अमेरिका के साथ संबंधों में तनाव पैदा करे।
भू-राजनीतिक अनिश्चितता
ईरान-इजरायल तनाव, पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा और अमेरिकी सैन्य दबाव—
इन सबने चाबहार परियोजना को जोखिम भरा निवेश बना दिया है।
क्या भारत ने चाबहार को पूरी तरह छोड़ दिया?
नहीं।
सरकारी सूत्रों के अनुसार—
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भारत ने परियोजना से औपचारिक रूप से पीछे हटने की घोषणा नहीं की है
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संचालन और कूटनीतिक स्तर पर संपर्क बना हुआ है
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लेकिन सीधा सरकारी फंड फिलहाल रोका गया है
इसका मतलब है कि भारत “Wait & Watch” की नीति अपना रहा है।
इसका भारत को क्या नुकसान हो सकता है?
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अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग कमजोर होगा
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INSTC की गति धीमी पड़ सकती है
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चीन के ग्वादर पोर्ट (पाकिस्तान) को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला आर्थिक से ज्यादा कूटनीतिक मजबूरी का परिणाम है।
सरकार को क्या स्पष्ट करना चाहिए?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
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क्या यह अस्थायी फैसला है या स्थायी रणनीतिक बदलाव?
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अगर हालात सुधरते हैं तो क्या फंड दोबारा मिलेगा?
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भारत की मध्य एशिया नीति अब किस दिशा में जाएगी?
इन सवालों पर सरकार की ओर से स्पष्ट बयान आना जरूरी माना जा रहा है।

बजट 2026 में चाबहार पोर्ट को फंड न देना सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि भारत की बदलती विदेश नीति और वैश्विक दबावों का संकेत है।
जहां एक ओर अमेरिका के साथ रिश्ते प्राथमिकता में हैं, वहीं दूसरी ओर भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और दीर्घकालिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
चाबहार पोर्ट पर भारत का रुख आने वाले महीनों में यह तय करेगा कि देश रणनीतिक साहस दिखाता है या वैश्विक दबावों के आगे झुकता है।
Hindu Solanki 
