मंदिर में भगवान के सामने लगता है ‘न्याय दरबार’, 750 साल से चली आ रही अनोखी परंपरा
जालोर की बड़ी पोल में स्थित करीब 750 साल पुराने ठाकुरद्वारा मंदिर में माली समाज की पांच पट्टी पंचायत बैठती है। यहां सामाजिक विवादों और महत्वपूर्ण मामलों पर दोनों पक्षों की बात सुनकर भगवान राधा-कृष्ण को साक्षी मानकर निर्णय लेने की परंपरा आज भी जारी है।
राजस्थान के जालोर शहर में एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर है, जहां आस्था के साथ सामाजिक फैसलों की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। बड़ी पोल में स्थित करीब 750 साल पुराना राधा-कृष्ण मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ठाकुरद्वारा के नाम से जानते हैं, माली समाज के लिए सिर्फ पूजा का स्थल नहीं बल्कि सामाजिक एकता और न्याय का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।
इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां माली समाज की पांच पट्टी पंचायत बैठती है। समाज से जुड़े विवाद या महत्वपूर्ण विषय सामने आने पर पंच और समाज के वरिष्ठ लोग मंदिर परिसर में एकत्रित होते हैं। दोनों पक्षों की बात सुनी जाती है और इसके बाद भगवान राधा-कृष्ण को साक्षी मानकर फैसला सुनाया जाता है।
भगवान राधा-कृष्ण को माना जाता है साक्षी
ठाकुरद्वारा में होने वाली पंचायत की अपनी अलग परंपरा है। यहां किसी व्यक्ति या पद को फैसले का आधार बनाने के बजाय मंदिर में विराजमान राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं के सामने निर्णय लिया जाता है।
समाज के लोगों का मानना है कि भगवान को साक्षी मानकर लिया गया फैसला निष्पक्ष और स्वीकार्य होना चाहिए। यही वजह है कि पंचायत के निर्णयों को समाज के लोग सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं।
मंदिर समिति के अध्यक्ष भोमाराम के मुताबिक, यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और आज भी समाज के महत्वपूर्ण मामलों में पंचायत की भूमिका बनी हुई है।
विवाद से लेकर सामाजिक मुद्दों तक पर होती है चर्चा
इस पंचायत में केवल आपसी विवादों पर ही चर्चा नहीं होती, बल्कि समाज से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। पारिवारिक विवाद, सामाजिक मतभेद और अन्य महत्वपूर्ण विषयों को पंचायत के सामने रखा जाता है।
इस व्यवस्था को समाज की सामूहिक सहमति और आपसी संवाद की परंपरा से भी जोड़कर देखा जाता है। पंचायत के दौरान दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद निर्णय लेने की कोशिश की जाती है।
2018 में लिया गया था बड़ा सामाजिक फैसला
ठाकुरद्वारा में हुई पंचायत का एक महत्वपूर्ण उदाहरण वर्ष 2018 का है। उस समय माली समाज की पंचायत में सामाजिक आयोजनों में होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करने को लेकर बड़ा निर्णय लिया गया था।
पंचायत ने मृत्युभोज, शादी समारोहों में डीजे और स्टेज प्रोग्राम जैसी फिजूलखर्ची पर रोक लगाने का फैसला किया था। इस निर्णय को समाज में सामाजिक सुधार और अनावश्यक खर्च कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
750 साल पुराना मंदिर आज भी समाज की पहचान
ठाकुरद्वारा मंदिर की पहचान केवल इसकी धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। इसकी प्राचीनता, स्थापत्य शैली और सामाजिक भूमिका इसे जालोर की खास धरोहरों में शामिल करती है।
मंदिर की पुरानी बनावट और मजबूत दीवारें इसके लंबे इतिहास की झलक देती हैं। विशेष अवसरों और त्योहारों पर मंदिर की सजावट श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
जन्माष्टमी के मौके पर यहां धार्मिक उत्सव का माहौल रहता है, वहीं मंदिर से जुड़ी सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
आज के दौर में जब सामाजिक विवादों को सुलझाने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं मौजूद हैं, ऐसे में 750 साल पुराने ठाकुरद्वारा में भगवान राधा-कृष्ण को साक्षी मानकर फैसले लेने की परंपरा अपने आप में जालोर की अनोखी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।

