दुनिया में शांति का नया दांव: ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’, भारत समेत कई देशों की बढ़ी सतर्कता

दावोस, स्विट्जरलैंड से बड़ी खबर! अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक संघर्षों को खत्म करने के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' की घोषणा कर दी है। गाजा युद्धविराम के बीच यह नया अंतरराष्ट्रीय मंच शांति बहाली का दावा कर रहा है। लेकिन भारत ने अभी दूरी बनाए रखी है।

दुनिया में शांति का नया दांव: ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’, भारत समेत कई देशों की बढ़ी सतर्कता

दावोस, स्विट्जरलैंड: दुनियाभर में जारी युद्ध और भू-राजनीतिक तनावों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कूटनीतिक कदम उठाया है। स्विट्जरलैंड के दावोस में ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नामक एक नए अंतरराष्ट्रीय मंच की नींव रखी है। ट्रंप का दावा है कि यह मंच गाजा में स्थायी शांति स्थापित करने के साथ-साथ दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी समाधान की दिशा में अहम भूमिका निभाएगा।

हालांकि, इस पहल को लेकर वैश्विक मंच पर प्रतिक्रियाएं बंटी हुई नजर आ रही हैं। कुछ देशों ने जहां इस बोर्ड का समर्थन किया है, वहीं कई बड़े और प्रभावशाली देश अभी भी इससे दूरी बनाए हुए हैं।

क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?

ट्रंप प्रशासन के अनुसार, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक नया अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका उद्देश्य युद्ध और संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में शांति बहाल करना, कानून के तहत स्थिर शासन व्यवस्था को बढ़ावा देना और लंबे समय तक टिकाऊ शांति सुनिश्चित करना है।

इस मंच की शुरुआत गाजा में इस्राइल-हमास युद्ध के बाद हुए युद्धविराम के दूसरे चरण के दौरान की गई है। ट्रंप का कहना है कि यह बोर्ड केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अन्य युद्धों और संघर्षों को समाप्त करने में भी मदद करेगा।

भारत की भूमिका पर क्यों बना सस्पेंस?

‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन के बाद भारत की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, लेकिन भारत दावोस में हुए इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बना। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार ने अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। इसे एक बेहद संवेदनशील कूटनीतिक पहल मानते हुए सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

भारत क्यों बरत रहा है सावधानी?

भारत की सतर्कता के पीछे उसकी लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति को अहम वजह माना जा रहा है। भारत लगातार इस्राइल-फलस्तीन विवाद में दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। भारत की नीति यह रही है कि इस्राइल और फलस्तीन दोनों अपने-अपने मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ रहें।

ऐसे में ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की संरचना और उसकी भूमिका भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।

क्या संयुक्त राष्ट्र की भूमिका होगी कमजोर?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की भूमिका को कमजोर कर सकता है। कई देशों और कूटनीतिक विशेषज्ञों को आशंका है कि यह नया मंच कहीं यूएन के प्रभाव को चुनौती देने वाला एक समानांतर ढांचा न बन जाए।

हालांकि ट्रंप ने यह जरूर कहा है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भी काम कर सकता है, लेकिन दोनों संस्थाओं के बीच तालमेल को लेकर अब तक कोई स्पष्ट रूपरेखा सामने नहीं आई है।

किन देशों ने दिया समर्थन?

ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को समर्थन देने वाले देशों में शामिल हैं—
अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाखस्तान, मोरक्को, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और वियतनाम।
इन देशों ने इस पहल को वैश्विक शांति की दिशा में एक नया प्रयोग बताया है।

कौन से देश अभी दूर?

वहीं दूसरी ओर कई बड़े और प्रभावशाली देश अभी भी इस पहल से दूर हैं या अनिश्चितता की स्थिति में हैं। इनमें शामिल हैं—
भारत, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, इटली, रूस, तुर्किये, यूक्रेन, स्लोवेनिया और पराग्वे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया मंच वैश्विक राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण को जन्म दे सकता है।