सौदेबाजी के दम पर BJP ने बनाए निगमों में बोर्ड? कांग्रेस ज्यादा पार्षद लाई, फिर भी Ajmer-Pali में BJP का मेयर
राजस्थान के 10 नगर निगमों के मेयर चुनाव में BJP ने 9 जगह जीत दर्ज की। अजमेर, पाली, अलवर, भरतपुर, जोधपुर और जयपुर के नतीजों से समझिए बदला राजनीतिक गणित।
राजस्थान के नगर निगम चुनाव में मतदाताओं ने एक तस्वीर बनाई, लेकिन मेयर चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते कई शहरों में राजनीतिक गणित बदल गया। कहीं कांग्रेस BJP से ज्यादा पार्षद लेकर आई। कहीं किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। भरतपुर में तो निर्दलीय पार्षद अपने दम पर बहुमत के पार पहुंच गए। इसके बावजूद अंतिम तस्वीर में राजस्थान के 10 नगर निगमों में से नौ में BJP का मेयर है। कांग्रेस केवल बीकानेर नगर निगम में मेयर बना सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन नगर निगमों में BJP के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था, वहां पार्टी ने बोर्ड का गणित कैसे अपने पक्ष में कर लिया? राजनीतिक विरोधी इसे जोड़-तोड़ या सत्ता के प्रभाव से जोड़ सकते हैं, लेकिन निर्दलीयों के समर्थन के बदले किसी अवैध सौदे का प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए आंकड़ों से फिलहाल जो स्थापित होता है, वह है निर्दलीयों का समर्थन, कुछ जगह क्रॉस-वोटिंग और BJP का सफल पोस्ट-पोल मैनेजमेंट।
अजमेर :- कांग्रेस 37, BJP 32; मेयर BJP का
अजमेर नगर निगम का परिणाम इस पूरी कहानी का सबसे साफ उदाहरण है। 80 सदस्यीय निगम में कांग्रेस ने 37 वार्ड जीते। BJP को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिलीं। बहुमत का आंकड़ा 41 था।
यानी कांग्रेस सिर्फ चार पार्षद दूर थी, जबकि BJP को नौ अतिरिक्त वोट चाहिए थे। लेकिन मेयर चुनाव में तस्वीर उलट गई। BJP की अनामिका शर्मा को 43 और कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले। इसका अर्थ है कि BJP प्रत्याशी अपने दल की मूल संख्या से 11 वोट ज्यादा हासिल करने में सफल रहीं। गुप्त मतदान के कारण इन अतिरिक्त मतों को किसी खास पार्षद से निश्चित रूप से जोड़ना संभव नहीं है।
पाली: 29 पार्षद वाली कांग्रेस की उम्मीदवार को सिर्फ 3 वोट
पाली में उलटफेर इससे भी बड़ा रहा। 65 सदस्यीय निगम में कांग्रेस के 29, BJP के 21 और निर्दलीय 15 पार्षद चुने गए थे। बहुमत के लिए 33 वोट जरूरी थे। लेकिन मेयर चुनाव में BJP की नमिता बुबकिया ने ठीक 33 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। निर्दलीय राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले। सबसे चौंकाने वाला परिणाम कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा जैन का रहा, जिन्हें केवल तीन वोट मिले। यानी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद अपने पार्षदों का वोट भी अपनी अधिकृत प्रत्याशी के पीछे एकजुट नहीं रख सकी।
अलवर: बहुमत से दूर BJP को मिले 42 वोट
अलवर में BJP के 28 और कांग्रेस के 23 पार्षद थे। 13 निर्दलीय और एक BSP पार्षद था। 65 सदस्यीय सदन में बहुमत का आंकड़ा 33 था। यानी BJP को भी बाहर से समर्थन की जरूरत थी। मेयर चुनाव में BJP की सुमनलता अग्रवाल को 42 वोट मिले, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश शर्मा को 23 वोट मिले। रिपोर्ट्स के अनुसार BJP को 13 निर्दलीयों और एक अन्य पार्षद का समर्थन मिला।
भरतपुर: निर्दलीय खुद बहुमत में, मेयर BJP की
भरतपुर का गणित सबसे अलग था। 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 36 सीटें जीतीं। BJP को 20 और कांग्रेस को सात सीटें मिलीं। एक-एक सीट BSP और RLP के खाते में गई। यानी 33 के बहुमत वाले निगम में निर्दलीय अपने दम पर मेयर बनाने की स्थिति में थे। इसके बावजूद BJP की अनुराधा सिंह निर्विरोध मेयर चुनी गईं। BJP के पास केवल 20 पार्षद होने के बावजूद मेयर पद मिलने में निर्दलीय खेमे के घटनाक्रम ने निर्णायक भूमिका निभाई।
जोधपुर: 45 पार्षदों वाली BJP को मिले 53 वोट
जोधपुर में री-पोल के बाद BJP के 45 और कांग्रेस के 44 पार्षद थे। 10 निर्दलीय और एक RLP पार्षद था। बहुमत के लिए 51 वोट जरूरी थे। BJP प्रत्याशी प्रसन्नचंद मेहता को 53 और कांग्रेस के राजेंद्र सिंह सोलंकी को 47 वोट मिले। चुनाव से पहले BJP ने सात निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का दावा किया था। अंतिम मतदान में पार्टी प्रत्याशी मूल BJP संख्या से आठ वोट ज्यादा लेकर मेयर बने।
जयपुर: अपने 78, लेकिन कोठारी को मिले 89
जयपुर में BJP को बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं थी। 150 वार्डों में BJP के 78, कांग्रेस के 57 और निर्दलीय 15 पार्षद थे। बहुमत का आंकड़ा 76 था। फिर भी मेयर चुनाव में BJP के सुनील कोठारी को 89 वोट मिले। कांग्रेस की सुनीता मावर को 60 और एक वोट NOTA को गया। यानी कोठारी को BJP की मूल संख्या से 11 ज्यादा वोट मिले। गुप्त मतदान होने के कारण अतिरिक्त मतों का व्यक्तिगत स्रोत निश्चित रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता।

