राजस्थान में खुले बोरवेल कब बनेंगे सुरक्षित? एक ढक्कन की लापरवाही, मासूमों की जिंदगी पर भारी

राजस्थान में खुले बोरवेल का खतरा बरकरार है। फलोदी में भोमाराम की मौत और रतनगढ़ में मिले 72 खुले बोरवेल ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

राजस्थान में खुले बोरवेल कब बनेंगे सुरक्षित? एक ढक्कन की लापरवाही, मासूमों की जिंदगी पर भारी

राजस्थान में खुले बोरवेल का खतरा एक बार फिर चर्चा में है। फलोदी जिले के लोहावट में 9 साल के भोमाराम की मौत ने सरकारी व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 40 घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद बच्चे को बाहर तो निकाल लिया गया, लेकिन उसकी जिंदगी नहीं बचाई जा सकी। इस घटना के बाद सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का भी है, जिसमें किसी खुले बोरवेल को सुरक्षित करने के बजाय कई बार उसके खतरनाक साबित होने का इंतजार किया जाता है।

हर बार जब कोई बच्चा खुले बोरवेल में गिरता है, तो प्रशासन से लेकर बचाव दल तक पूरी मशीनरी सक्रिय हो जाती है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंचती हैं। भारी मशीनें बुलाई जाती हैं, खुदाई होती है और बच्चे तक पहुंचने के लिए अलग-अलग तकनीकों का सहारा लिया जाता है। कई घंटे या कई दिन तक चलने वाले इन अभियानों में बड़ी संख्या में कर्मचारी और संसाधन जुटाने पड़ते हैं। लेकिन इतना सब होने के बावजूद हर बार जिंदगी नहीं बच पाती।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खुले बोरवेल पहले से मौजूद खतरा हैं, तो उन्हें हादसे से पहले सुरक्षित करने के लिए ठोस और स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही है?

फलोदी में भोमाराम की मौत ने फिर उठाए सवाल

फलोदी जिले के लोहावट में 9 वर्षीय भोमाराम के बोरवेल में गिरने की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। जानकारी के मुताबिक, बच्चा करीब 1050 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था और लगभग 640 फीट की गहराई पर फंस गया। घटना की सूचना मिलने के बाद प्रशासन और बचाव दल मौके पर पहुंचे और बच्चे को बाहर निकालने के लिए अभियान शुरू किया गया।

रेस्क्यू ऑपरेशन आसान नहीं था। बोरवेल के भीतर पत्थरों की मौजूदगी और लगातार पानी आने के कारण बचाव कार्य में बाधाएं आती रहीं। बच्चे तक पहुंचने के लिए कई प्रयास किए गए। आखिरकार शुक्रवार रात करीब 3 बजे उसे बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

करीब 40 घंटे तक चले इस अभियान का अंत एक परिवार के लिए कभी न भरने वाले दुख के रूप में हुआ। इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या प्रशासन की प्राथमिकता केवल हादसे के बाद राहत और बचाव तक सीमित रहनी चाहिए, या ऐसे हादसों की आशंका को पहले ही खत्म करने की दिशा में भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जानी चाहिए?

 दौसा से कोटपुतली तक, हादसों का दर्द एक जैसा

राजस्थान में खुले बोरवेल से जुड़े हादसे पहली बार सामने नहीं आए हैं। इससे पहले दौसा जिले में पांच वर्षीय आर्यन और कोटपुतली क्षेत्र में तीन वर्षीय चेतना के साथ भी ऐसी घटनाएं हुई थीं। इन मामलों ने प्रदेश में बोरवेल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा की थी।

दौसा के कालीखाड़ गांव में पांच वर्षीय आर्यन के बोरवेल में गिरने के बाद बचाव दल ने करीब 52 से 56 घंटे तक अभियान चलाया। बच्चे को बाहर निकालने के लिए मशीनों और तकनीकी संसाधनों की मदद ली गई। तमाम प्रयासों के बावजूद आर्यन को बचाया नहीं जा सका। परिवार की उम्मीदें और बच्चे को सुरक्षित देखने की आस आखिरकार टूट गई।

इसके बाद कोटपुतली में तीन वर्षीय चेतना के बोरवेल में गिरने की घटना ने एक बार फिर पूरे प्रदेश का ध्यान इस खतरे की ओर खींचा। बच्ची को बचाने के लिए करीब 180 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चला। लंबे समय तक चले इस अभियान में बचाव दल को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

इन घटनाओं के बीच एक बात समान रही। हादसा होने के बाद पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हुई, बचाव के लिए बड़े स्तर पर इंतजाम किए गए और लोगों की निगाहें रेस्क्यू ऑपरेशन पर टिक गईं। लेकिन इन घटनाओं के बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि खुले बोरवेल की पहचान और सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई, जो किसी बच्चे को इस तरह के खतरे में पड़ने से पहले ही बचा सके?

रतनगढ़ में मिले 72 खुले बोरवेल, प्रदेश की तस्वीर क्या होगी?

खुले बोरवेल की समस्या कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाजा चूरू जिले के रतनगढ़ उपखंड में मिले 72 खुले बोरवेल से लगाया जा सकता है। कोटपुतली की घटना के बाद खुले बोरवेल की तलाश के लिए चलाए गए अभियान के दौरान इन बोरवेल की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद इन्हें सुरक्षित करने की कार्रवाई की बात कही गई।

यह आंकड़ा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। अगर एक उपखंड में ही 72 खुले बोरवेल मिल सकते हैं, तो प्रदेश के दूसरे ग्रामीण इलाकों में स्थिति क्या होगी? क्या सभी जिलों में ऐसे बोरवेल की पहचान के लिए एक समान सर्वे किया गया है? क्या प्रशासन के पास यह जानकारी है कि कितने बोरवेल चालू हैं, कितने अनुपयोगी पड़े हैं और कितने ऐसे हैं, जिनसे किसी भी समय दुर्घटना हो सकती है?

इन सवालों का जवाब व्यवस्थित सर्वे और पारदर्शी आंकड़ों से ही मिल सकता है। केवल कुछ इलाकों में जांच कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। प्रदेश के हर जिले, गांव और आबादी के आसपास मौजूद खुले बोरवेल की पहचान करना जरूरी है, ताकि खतरे को केवल हादसों की खबरों के आधार पर नहीं, बल्कि समय रहते कार्रवाई करके खत्म किया जा सके।

 हर हादसे के बाद निर्देश, लेकिन जमीन पर कितनी कार्रवाई?

बोरवेल हादसों के बाद सर्वे कराने और खुले बोरवेल के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाते रहे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी अधिकारियों को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दे चुके हैं। लेकिन किसी भी सरकारी निर्देश की असली सफलता उसके जारी होने में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों में होती है।

सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रदेश में खुले बोरवेल की कुल संख्या कितनी है। इसके बाद उनकी स्थिति, स्थान और जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था की जानकारी दर्ज की जानी चाहिए। जहां बोरवेल अनुपयोगी हैं, वहां उन्हें नियमानुसार सुरक्षित तरीके से बंद कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं, चालू बोरवेल के लिए भी ऐसे सुरक्षा इंतजाम जरूरी हैं, जिससे कोई व्यक्ति या बच्चा अनजाने में उसमें न गिर सके।

इस काम में ग्राम पंचायतों, स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। गांवों में नियमित निरीक्षण, शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, लापरवाही पाए जाने पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, ताकि खुले बोरवेल को लेकर नियम केवल कागजों तक सीमित न रह जाएं।

सवाल यह भी है कि सर्वे के दौरान चिह्नित किए गए बोरवेल को सुरक्षित करने की निगरानी कौन करेगा? क्या प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि कार्रवाई पूरी होने के बाद दोबारा जांच भी की जाए? जब तक इन सवालों का जवाब एक स्पष्ट व्यवस्था के रूप में सामने नहीं आता, तब तक खतरा पूरी तरह समाप्त होने का दावा करना मुश्किल होगा।

 कुछ पैसों की सावधानी बनाम लाखों का रेस्क्यू ऑपरेशन

खुले बोरवेल की समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संभावित खतरे को पहले ही दूर करने की तुलना में हादसे के बाद बचाव अभियान कहीं अधिक जटिल हो जाता है। एक बार बच्चा बोरवेल में गिर जाए, तो उसे सुरक्षित बाहर निकालने के लिए भारी मशीनों, तकनीकी विशेषज्ञों, पुलिसकर्मियों और बचाव दलों की जरूरत पड़ सकती है। अभियान लंबा खिंचने पर संसाधनों और खर्च में भी बढ़ोतरी होती है।

दूसरी ओर, बोरवेल को सुरक्षित करने के लिए समय रहते उचित कदम उठाना कई मामलों में दुर्घटना की आशंका को कम कर सकता है। हालांकि, सुरक्षा का तरीका बोरवेल की स्थिति और तकनीकी जरूरतों के अनुसार तय किया जाना चाहिए। केवल ऊपर से ढक्कन रख देना हर स्थिति में पर्याप्त नहीं है। उसे इस तरह सुरक्षित करना जरूरी है कि वह हटे नहीं, टूटे नहीं और किसी बच्चे के लिए खतरा न बने।

इसलिए बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि खुले बोरवेल को बंद करने में कितना खर्च आएगा। असली सवाल यह है कि जब किसी की जान दांव पर हो, तो सुरक्षा सुनिश्चित करने में लापरवाही की गुंजाइश आखिर क्यों रहे?

 जिम्मेदारी किसकी, और जवाबदेही कब तय होगी?

खुले बोरवेल के मामले में जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी है। किसी जमीन पर बोरवेल खुदवाया गया है, उसका इस्तेमाल बंद हो चुका है या वह लंबे समय से अनुपयोगी पड़ा है, तो उसकी मौजूदा स्थिति की जानकारी प्रशासन तक पहुंचनी चाहिए। संबंधित मालिक या जिम्मेदार व्यक्ति को लागू नियमों के अनुसार उसे सुरक्षित करने की जवाबदेही निभानी चाहिए।

प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल लोगों से सावधानी बरतने की अपील करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है कि खुले बोरवेल की पहचान, सुरक्षा और निरीक्षण के लिए नियमित व्यवस्था बने। शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय हो और लापरवाही सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है। बच्चों को यह समझाना कि खुले गड्ढों और बोरवेल के आसपास नहीं जाना चाहिए, मददगार हो सकता है। लेकिन बच्चों की सावधानी को ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय नहीं बनाया जा सकता। आखिरकार, बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना बड़ों, समाज और प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

अब सवाल रेस्क्यू का नहीं, हादसा रोकने का है

भोमाराम, आर्यन और चेतना से जुड़ी घटनाएं याद दिलाती हैं कि खुले बोरवेल का खतरा किसी एक गांव या जिले तक सीमित नहीं है। हर हादसे के बाद लोगों की संवेदनाएं जागती हैं, बचाव अभियान की चर्चा होती है और व्यवस्था को दुरुस्त करने की मांग उठती है। लेकिन कुछ समय बीतने के बाद वही सवाल फिर सामने आ जाता है।

क्या राजस्थान में खुले बोरवेल की पहचान के लिए पूरे प्रदेश में समयबद्ध सर्वे होगा? क्या चिह्नित बोरवेल को सुरक्षित करने की कार्रवाई की निगरानी की जाएगी? क्या जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार ऐसी स्थायी व्यवस्था बना पाएगी, जिसमें किसी बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए हादसे के बाद 40, 50 या 180 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने की नौबत ही न आए?

इन सवालों का जवाब केवल बैठकों, निर्देशों और घोषणाओं से नहीं मिलेगा। इसके लिए ठोस कार्रवाई, नियमित निगरानी और जवाबदेही जरूरी है।

भोमाराम की मौत के बाद राजस्थान के सामने एक बार फिर वही चुनौती है—क्या व्यवस्था अगली दुर्घटना का इंतजार करेगी या उससे पहले खतरे को खत्म करने के लिए कदम उठाएगी? क्योंकि किसी परिवार के लिए अपने बच्चे को खोने का दुख कभी छोटा नहीं हो सकता और किसी भी रेस्क्यू ऑपरेशन की सफलता से बड़ी उपलब्धि यही होगी कि ऐसा हादसा होने ही न दिया जाए।