360 साल पहले विलुप्त हुआ डोडो पक्षी फिर लौटेगा? वैज्ञानिकों ने जीन के रहस्यों को समझने में हासिल की बड़ी सफलता
360 साल पहले विलुप्त हुआ डोडो फिर चर्चा में है। AI और जीनोमिक रिसर्च से वैज्ञानिक इसके DNA और जैविक इतिहास को समझ रहे हैं। क्या सच में डोडो वापस आ सकता है?
दुनिया से करीब 360 साल पहले विलुप्त हो चुका डोडो पक्षी एक बार फिर वैज्ञानिकों के शोध के केंद्र में है। वैज्ञानिक इसके आनुवंशिक रहस्यों यानी जीन से जुड़ी जानकारियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस दिशा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक जीनोमिक तकनीकों की मदद ली जा रही है। इस शोध का उद्देश्य डोडो के जैविक इतिहास को बेहतर ढंग से समझना और भविष्य में विलुप्त प्रजातियों को वापस लाने की संभावनाओं का अध्ययन करना है।
आखिर क्या था डोडो पक्षी?
डोडो एक उड़ान न भर सकने वाला पक्षी था, जो हिंद महासागर में स्थित मॉरीशस द्वीप पर पाया जाता था। इसका शरीर भारी, चोंच बड़ी और पंख छोटे थे। इंसानों के वहां पहुंचने के बाद शिकार, जंगलों में बदलाव और बाहरी जीवों के प्रभाव ने इसकी आबादी को नुकसान पहुंचाया। 17वीं सदी के उत्तरार्ध तक यह पक्षी विलुप्त हो गया।
डोडो आज विलुप्त होती प्रजातियों के संरक्षण और जैव विविधता से जुड़े शोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
डोडो के जीन समझने में AI कैसे करेगा मदद?
किसी जीव के जीनोम में उसकी जैविक संरचना और विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी होती है। विलुप्त जीवों के मामले में वैज्ञानिकों को अक्सर पुराने अवशेषों से प्राप्त DNA पर निर्भर रहना पड़ता है। समय के साथ DNA टूट सकता है या उसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है, जिससे उसका अध्ययन मुश्किल हो जाता है।
AI और कंप्यूटर आधारित विश्लेषण की मदद से वैज्ञानिक आनुवंशिक डेटा में पैटर्न खोज सकते हैं, अलग-अलग प्रजातियों के जीनोम की तुलना कर सकते हैं और विकास की प्रक्रिया को समझने में मदद पा सकते हैं। हालांकि, AI अपने आप किसी विलुप्त पक्षी को जीवित नहीं कर सकता। इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी से जुड़ी कई जटिल समस्याओं का समाधान जरूरी होगा।
क्या सच में वापस आ सकता है डोडो?
विलुप्त प्रजातियों को दोबारा अस्तित्व में लाने की अवधारणा को 'डी-एक्सटिंक्शन' कहा जाता है। इसमें प्राचीन DNA का अध्ययन, वर्तमान में मौजूद करीबी प्रजातियों से आनुवंशिक तुलना और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी जैसी तकनीकों पर काम किया जाता है।
लेकिन डोडो को वापस लाने के रास्ते में कई बाधाएं हैं। केवल उसके जीन की जानकारी मिल जाना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिकों को यह भी समझना होगा कि उन आनुवंशिक निर्देशों को किसी जीवित कोशिका और विकसित होते भ्रूण में किस तरह लागू किया जा सकता है। इसके अलावा, उपयुक्त प्रजनन तकनीक, जीव के विकास और उसके लिए सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण जैसे सवाल भी अहम हैं।
इसलिए जीन संबंधी शोध में सफलता को डोडो के दोबारा जीवित हो जाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
विलुप्त प्रजातियों के संरक्षण में क्या होगा फायदा?
इस तरह के शोध से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि प्रजातियां समय के साथ कैसे विकसित हुईं और पर्यावरण में बदलाव ने उनके अस्तित्व को किस तरह प्रभावित किया। इससे वर्तमान में संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और उनकी आनुवंशिक विविधता के अध्ययन को भी लाभ मिल सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों के सामने यह सवाल भी है कि विलुप्त प्रजातियों को वापस लाने पर खर्च किए जाने वाले संसाधनों और मौजूदा संकटग्रस्त जीवों के संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
डोडो को दोबारा जीवित करने की कोशिश विज्ञान की संभावनाओं और सीमाओं, दोनों को सामने लाती है। AI और जीनोमिक तकनीकें इस दिशा में नए रास्ते खोल सकती हैं, लेकिन फिलहाल डोडो की वापसी को तय उपलब्धि नहीं, बल्कि शोध की एक चुनौतीपूर्ण संभावना के रूप में देखना चाहिए।

