अरुणाचल प्रदेश में चीन की गतिविधियों के बीच ITBP बढ़ा रहा शौर्य कमांडो की ताकत, क्या है इनकी खासियत?
ITBP के शौर्य कमांडो कौन हैं, उन्हें खास ट्रेनिंग क्यों दी जा रही है और भारतीय सेना की घातक प्लाटून से उनकी भूमिका कैसे अलग है? जानिए LAC पर भारत की सीमा सुरक्षा की पूरी कहानी।
समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई, चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़, ऑक्सीजन की कमी और तापमान माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की परिस्थितियां। भारत-चीन सीमा के कुछ हिस्सों में सुरक्षा बलों को ऐसी ही कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन इलाकों में तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी ITBP के जवानों की जिम्मेदारी केवल सीमा की निगरानी करना नहीं, बल्कि कठिन मौसम और संवेदनशील परिस्थितियों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना भी है।
अब ITBP अपने विशेष प्रशिक्षित 'शौर्य कमांडो' दस्तों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, ITBP महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर को अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भारत और चीन के जवानों के आमने-सामने आने की घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने इन परिस्थितियों में शौर्य कमांडो दस्तों की भूमिका की सराहना भी की। इस बीच अरुणाचल प्रदेश में चीन की गतिविधियों और सीमा के आसपास सैन्य बुनियादी ढांचे के विस्तार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर शौर्य कमांडो कौन हैं? ये भारतीय सेना की घातक प्लाटून से कैसे अलग हैं? क्या चीन अरुणाचल प्रदेश में दबाव बढ़ा रहा है और भारत की क्या तैयारी है? समझिए आज के एक्सप्लेनर में।
सवाल 1: ITBP के 'शौर्य कमांडो' कौन हैं?
जवाब: शौर्य कमांडो भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के विशेष प्रशिक्षित जवानों के दस्ते हैं, जिन्हें चुनौतीपूर्ण सीमावर्ती परिस्थितियों में कार्रवाई के लिए तैयार किया जा रहा है। ITBP भारत की एक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है, जिसका गठन 24 अक्टूबर 1962 को हुआ था। यह वही समय था, जब भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था। ITBP की प्रमुख जिम्मेदारियों में भारत-चीन सीमा की निगरानी, सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा और कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में तैनाती शामिल है। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी Line of Actual Control (LAC) की लंबाई भारत सरकार के अनुसार लगभग 3,488 किलोमीटर मानी जाती है। इस सीमा के विभिन्न हिस्सों में ITBP और भारतीय सेना की अलग-अलग तथा समन्वित भूमिकाएं हैं। 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद सीमा पर सैनिकों के आमने-सामने आने जैसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारियों का महत्व और बढ़ गया। शौर्य कमांडो दस्तों को इसी तरह की कठिन परिस्थितियों में विशेष प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
सवाल 2: शौर्य कमांडो की जरूरत क्यों पड़ी?
जवाब: हिमालयी सीमा पर सामान्य गश्त और अचानक पैदा होने वाली गंभीर परिस्थितियों से निपटने की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। कई इलाकों में जवानों को अत्यधिक ऊंचाई, बर्फबारी, तेज हवाओं और सीमित संचार सुविधाओं के बीच काम करना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों में यदि दूसरी तरफ के सैनिकों के साथ अचानक आमना-सामना हो जाए, तो हालात को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेष प्रशिक्षित दस्ते इन परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया, बेहतर समन्वय और कठिन भूभाग में प्रभावी संचालन के लिए उपयोगी हो सकते हैं। शौर्य कमांडो की ट्रेनिंग का उद्देश्य ऐसी ही क्षमताओं को मजबूत करना बताया गया है।
सवाल 3: क्या ITBP शौर्य कमांडो की संख्या बढ़ा रहा है?
जवाब: उपलब्ध विवरण के अनुसार, ITBP अपने विशेष प्रशिक्षित दस्तों का विस्तार करने की दिशा में काम कर रहा है। महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के हवाले से बताया गया है कि भविष्य में शौर्य कमांडो की एक पूर्ण बटालियन तैयार करने की योजना पर काम किया जा रहा है। हालांकि, इस प्रस्ताव की वर्तमान स्थिति, प्रत्येक बटालियन में उपलब्ध दस्तों की संख्या और नए कमांडो की कुल स्वीकृत संख्या की पुष्टि आधिकारिक ITBP दस्तावेजों से आवश्यक है। विशेष दस्तों का विस्तार सीमा पर तैनात नियमित बलों की क्षमताओं को मजबूत कर सकता है।
सवाल 4: शौर्य कमांडो और भारतीय सेना की 'घातक प्लाटून' में क्या अंतर है?
जवाब: भारतीय सेना की घातक प्लाटून और ITBP के शौर्य कमांडो, दोनों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, लेकिन उनकी संस्थागत भूमिका अलग है। भारतीय सेना की घातक प्लाटून पैदल सेना की बटालियनों से जुड़ी विशेष प्रशिक्षित टुकड़ी होती है। इनका उपयोग सैन्य अभियानों में अग्रिम कार्रवाई और कठिन युद्धक परिस्थितियों के लिए किया जा सकता है। वहीं, ITBP के शौर्य कमांडो की भूमिका सीमा सुरक्षा बल की जिम्मेदारियों के भीतर विशेष प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करने से संबंधित है। भारतीय सेना का मुख्य कार्य राष्ट्रीय रक्षा और सैन्य अभियान है, जबकि ITBP की भूमिका सीमा निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। दोनों बल जरूरत पड़ने पर समन्वय के साथ काम कर सकते हैं।
सवाल 5: माइनस 45 डिग्री तापमान में जवान कैसे काम करते हैं?
जवाब: हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होती है। ITBP की कई सीमा चौकियां समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। कुछ स्थानों पर सर्दियों में तापमान अत्यधिक नीचे चला जाता है। ऐसी परिस्थितियों में जवानों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
ऑक्सीजन की कमी: ऊंचाई बढ़ने के साथ वातावरण में ऑक्सीजन का आंशिक दबाव घटता है, जिससे शरीर को अनुकूलन की जरूरत होती है।
अत्यधिक ठंड: कम तापमान में शरीर का तापमान गिरने और शीतदंश जैसी समस्याओं का खतरा रहता है।
बर्फीले तूफान: तेज हवाएं, भारी बर्फबारी और खराब दृश्यता गश्त को मुश्किल बना सकती हैं।
हिमस्खलन: कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ खिसकने का खतरा भी रहता है।
इन परिस्थितियों में काम करने के लिए विशेष कपड़े, उपकरण, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां आवश्यक होती हैं।
सवाल 6: चीनी सैनिकों से आमने-सामने की स्थिति में
शौर्य कमांडो क्या करते हैं?


