दिल्ली में प्रदर्शन रोकने की रणनीति पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने मांगी माफी; 45 मेट्रो स्टेशन भी रहे प्रभावित
दिल्ली प्रदर्शन मामले में गृह सचिव गोविंद मोहन ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगी। जानिए इंटरनेट बंदी, 45 मेट्रो स्टेशनों और हिरासत पर क्या है पूरा मामला।
दिल्ली में एक प्रदर्शन को लेकर किए गए सुरक्षा इंतजाम अब खुद सरकार के लिए कानूनी सवाल बन गए हैं। मोबाइल इंटरनेट पर रोक, मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास बंद करने और हजारों लोगों को हिरासत में लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखना पड़ा है। मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि आम लोगों की आवाजाही और विरोध प्रदर्शन के अधिकार का भी बन गया है।
केंद्र सरकार के गृह सचिव गोविंद मोहन ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बिना शर्त माफी मांगी है। हालांकि, सरकार ने इंटरनेट सेवा रोकने के फैसले का बचाव भी किया। उसका कहना है कि राजधानी में शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी समझा गया था। सरकार ने अदालत से भविष्य में विशेष परिस्थितियों में कानून के तहत इंटरनेट बंद करने की अनुमति से जुड़े आदेश में बदलाव करने का अनुरोध भी किया है।
इंटरनेट बंदी और मेट्रो प्रतिबंध पर उठे सवाल
10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के रायसीना हिल्स के आसपास करीब चार किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं 24 घंटे के लिए बंद की गई थीं। प्रतिबंध 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक लागू रहा। सरकार का तर्क है कि यह कदम संभावित अव्यवस्था को रोकने के लिए उठाया गया था।
इसी दौरान दिल्ली मेट्रो के 303 स्टेशनों में से 45 पर प्रवेश और निकास सीमित किया गया। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मेट्रो प्रशासन से कुछ स्टेशनों पर पाबंदी लगाने और ट्रेनों की आवाजाही नियंत्रित करने को कहा था। मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं हुई थीं, लेकिन प्रभावित स्टेशनों पर यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
7 हजार लोगों को हिरासत में लेने का मामला भी चर्चा में
प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने विवाद को और बढ़ा दिया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों की आवाजाही, इंटरनेट और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों के साथ हिरासत में लेने की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। मीडिया रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या करीब 7 हजार बताई गई, हालांकि इस आंकड़े को लेकर आधिकारिक जानकारी और दावों में अंतर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लेने की बात कही थी। अदालत ने सामान्य आवाजाही और मेट्रो सेवाएं बहाल रखने तथा इंटरनेट सेवाओं को बाधित नहीं करने के निर्देश भी दिए थे।
CEC के इस्तीफे की मांग से शुरू हुआ विवाद
CJP और अन्य संगठनों का प्रदर्शन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर था। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए थे। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और प्रशासन की दलील है कि संवेदनशील इलाकों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी था।
अब सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सवाल यह है कि सुरक्षा के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध कितने जरूरी और उचित थे, और क्या उनसे आम नागरिकों की आवाजाही तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर जरूरत से ज्यादा असर पड़ा। केंद्र की माफी के बाद भी मामला खत्म होता नहीं दिख रहा, क्योंकि अदालत के सामने प्रतिबंधों और हिरासत की कार्रवाई से जुड़े सवालों पर जवाबदेही का मुद्दा बना हुआ है।

