ऊंटनी के दूध पर राजस्थान के वैज्ञानिकों का बड़ा शोध, मिला पेटेंट; उत्पादों की सेल्फ लाइफ दोगुनी होने का दावा
बीकानेर के राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को ऊंटनी के दूध के प्रोटीन पर किए शोध के लिए पेटेंट मिला है। अल्ट्रासोनिक तकनीक और एंजाइम से प्रोटीन हाइड्रोलिसिस में सुधार कर मूल्यवर्धित डेयरी उत्पादों की संभावनाओं पर काम किया गया है।
राजस्थान में ऊंट पालन से जुड़े पशुपालकों के लिए ऊंटनी के दूध को लेकर एक नई वैज्ञानिक पहल सामने आई है। बीकानेर स्थित राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने ऊंटनी के दूध के प्रोटीन पर किए गए शोध के लिए भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से पेटेंट हासिल किया है। विश्वविद्यालय के मुताबिक इस तकनीक का उद्देश्य ऊंटनी के दूध से तैयार उत्पादों के कार्यात्मक गुणों और उपयोग की संभावनाओं को बेहतर करना है।
अल्ट्रासोनिक तकनीक और एंजाइम से प्रोटीन पर काम
इस शोध में ऊंटनी के दूध से प्राप्त कैसीन प्रोटीन पाउडर को अल्ट्रासोनिक किरणों और एंजाइम आधारित हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया से संशोधित किया गया। शोध में यह देखा गया कि अल्ट्रासाउंड और एंजाइम के संयोजन से प्रोटीन के हाइड्रोलिसिस को बढ़ाया जा सकता है। प्रकाशित शोध के अनुसार इस प्रक्रिया से प्रोटीन हाइड्रोलायसेट में कार्यात्मक गुणों और एंटीऑक्सीडेंट क्षमता में सुधार के संकेत मिले।
उत्पादों की गुणवत्ता और यील्ड पर फोकस
शोध का एक अहम पहलू ऊंटनी के दूध से बनने वाले उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने प्रोटीन की संरचना में नियंत्रित बदलाव के जरिए ऐसे गुण विकसित करने पर काम किया, जिनका इस्तेमाल भविष्य में फंक्शनल फूड और अन्य दुग्ध उत्पादों के विकास में किया जा सकता है। शोध टीम में डॉ. राजकुमार बेरवाल समेत RAJUVAS और ICAR-National Research Centre on Camel, बीकानेर से जुड़े वैज्ञानिक शामिल रहे हैं।
सेल्फ लाइफ बढ़ने से बाजार तक पहुंच आसान होने की उम्मीद
शोध से जुड़े दावों के अनुसार तैयार दुग्ध उत्पादों की सेल्फ लाइफ सामान्य उत्पादों की तुलना में दोगुनी पाई गई। अगर इस तकनीक का व्यावसायिक स्तर पर सफल उपयोग होता है तो ऊंटनी के दूध से बने उत्पादों के भंडारण और परिवहन की अवधि बढ़ सकती है। इसका मतलब यह भी है कि ऊंट पालन वाले दूरदराज के इलाकों से ऐसे उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, पेटेंट मिलना किसी तकनीक के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग की गारंटी नहीं है। इसके लिए उत्पादन, लागत, खाद्य सुरक्षा और बाजार की व्यवहारिकता जैसे पहलुओं का आगे मूल्यांकन जरूरी होगा।
पशुपालकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
राजस्थान के कई इलाकों में ऊंट पालन पारंपरिक आजीविका से जुड़ा हुआ है। ऐसे में ऊंटनी के दूध का सिर्फ ताजा दूध के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय उससे पाउडर, प्रोटीन आधारित उत्पाद या अन्य मूल्यवर्धित डेयरी उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं पशुपालकों के लिए अतिरिक्त बाजार खोल सकती हैं।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक पेटेंट हासिल करने वाली तकनीक ऊंटनी के दूध में मौजूद प्रोटीन हाइड्रोलायटेट के कार्यात्मक गुणों और जैवसक्रिय क्षमता को बढ़ाने से संबंधित है। विश्वविद्यालय ने इसे ऊंटनी के दूध की उपयोगिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण शोध उपलब्धि बताया है।
ऊंटनी के दूध की मार्केट वैल्यू बढ़ाने की दिशा में कदम
ऊंटनी के दूध को भारत में खाद्य पदार्थ के तौर पर नियामकीय मान्यता भी प्राप्त है और ICAR के अनुसार इसके लिए बिक्री एवं व्यापार से जुड़े विशेष मानक तय किए गए हैं। ऐसे में दूध की प्रोसेसिंग और उससे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने वाली तकनीकें इस क्षेत्र के लिए आगे महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
बीकानेर के वैज्ञानिकों को मिला यह पेटेंट इस लिहाज से अहम है कि शोध को अब एक औपचारिक बौद्धिक संपदा मान्यता मिल चुकी है। आगे यदि तकनीक का व्यावसायिक स्तर पर सफल इस्तेमाल होता है, तो ऊंटनी के दूध से बनने वाले नए उत्पादों और पशुपालकों के लिए नए बाजार अवसर विकसित हो सकते हैं।

