पायलट की सेना के सामने बेअसर हुए डोटासरा? निकाय चुनाव में Sachin Pilot की सीमित मौजूदगी ने बढ़ाए सियासी सवाल

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे कांग्रेस के भीतर सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा के राजनीतिक प्रभाव का भी अप्रत्यक्ष टेस्ट बन सकते हैं। पायलट की सीमित चुनावी सक्रियता और डोटासरा की संगठनात्मक रणनीति के बीच नतीजों से राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की दिशा तय होने के संकेत हैं।

पायलट की सेना के सामने बेअसर हुए डोटासरा? निकाय चुनाव में Sachin Pilot की सीमित मौजूदगी ने बढ़ाए सियासी सवाल

राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं है। कांग्रेस के अंदर भी चुनाव के बाद नेतृत्व और संगठन की ताकत को लेकर नया राजनीतिक हिसाब खुल सकता है। सबसे बड़ा सवाल सचिन पायलट और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के समीकरण को लेकर है।

चुनाव के अंतिम चरण में कांग्रेस की प्रचार रणनीति भाजपा से काफी अलग दिखाई दी। भाजपा ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समेत प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को अलग-अलग शहरों में उतारा, जबकि कांग्रेस काफी हद तक स्थानीय नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों के भरोसे चुनाव लड़ती दिखी। डोटासरा का अभियान भी मुख्य रूप से सीकर और लक्ष्मणगढ़ के आसपास केंद्रित रहने की रिपोर्ट सामने आई। सचिन पायलट की प्रदेशव्यापी प्रचार मौजूदगी भी सीमित रही।

बगावत संभालना डोटासरा के लिए बड़ी चुनौती

कांग्रेस में टिकट वितरण के बाद कई जगह अंदरूनी खींचतान सामने आई। प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा ने जिलों से गुटबाजी और विवादों की रिपोर्ट मांगी। पार्टी प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ रहे बागियों को छह साल तक निलंबित करने की चेतावनी भी दी गई। इससे साफ है कि इस चुनाव में कांग्रेस के लिए विपक्षी दल से लड़ने के साथ अपना घर संभालना भी बड़ी चुनौती रहा। 

यहीं से पायलट फैक्टर चर्चा में आता है।

पायलट पूरी तरह चुनाव से दूर नहीं

पायलट को निकाय चुनाव से पूरी तरह गायब बताना सही नहीं होगा। उन्होंने चुनाव को लेकर सार्वजनिक बयान दिए, कांग्रेस के पक्ष में माहौल होने का दावा किया और चुनावी प्रक्रिया को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना भी साधा। लेकिन यह भी सच है कि उनकी भूमिका प्रदेशव्यापी स्टार प्रचारक जैसी नजर नहीं आई। राजनीतिक हलकों में इसे अलग-अलग तरीके से पढ़ा जा रहा है। कुछ इसे पायलट की रणनीतिक दूरी मानते हैं, तो दूसरी व्याख्या उनकी नई राष्ट्रीय जिम्मेदारी से जुड़ी है।

पंजाब ने बदला पूरा समीकरण

कांग्रेस हाईकमान ने हाल ही में सचिन पायलट को चुनावी राज्य पंजाब का प्रभारी बनाया है। पंजाब कांग्रेस खुद अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही है और अगले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को एकजुट करना पायलट की बड़ी जिम्मेदारी होगी। ऐसे में राजस्थान में उनकी सीमित सक्रियता को केवल डोटासरा के खिलाफ राजनीतिक चाल कहना तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं होता। फिर भी निकाय चुनाव के नतीजे राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर असर जरूर डाल सकते हैं।

जीत हुई तो डोटासरा मजबूत, हार हुई तो सवाल

अगर कांग्रेस निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो डोटासरा दावा कर सकेंगे कि उनकी संगठनात्मक रणनीति, स्थानीय नेतृत्व और प्रत्याशी चयन काम आया। लेकिन यदि परिणाम कमजोर रहे और बड़ी संख्या में सीटें बगावत या भीतरघात की वजह से हाथ से निकलती हैं, तो सवाल प्रदेश नेतृत्व पर उठना स्वाभाविक होगा। ऐसे हालात में पायलट खेमा राजनीतिक रूप से मजबूत तर्क के साथ सामने आ सकता है कि राजस्थान में कांग्रेस को चुनावी सफलता के लिए पायलट और उनके समर्थक नेटवर्क को केंद्रीय भूमिका देनी होगी।

क्या यही है ‘पायलट की सेना’ का असली टेस्ट?

सचिन पायलट लंबे समय तक राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं और आज भी युवाओं तथा पार्टी कार्यकर्ताओं के एक हिस्से में उनका मजबूत प्रभाव माना जाता है। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में पायलट और डोटासरा से जुड़े खेमों की प्रतिस्पर्धा पहले भी दिखाई दे चुकी है। यही वजह है कि निकाय चुनाव एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक टेस्ट भी बन सकता है। अगर पायलट की व्यापक प्रचार भूमिका के बिना कांग्रेस कमजोर पड़ती है, तो उनके समर्थक इसे उनके राजनीतिक महत्व के प्रमाण के तौर पर पेश कर सकते हैं। अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती है तो डोटासरा की स्थिति मजबूत होगी और यह तर्क कमजोर पड़ेगा। इसलिए असली कहानी “पायलट ने कांग्रेस को हराने का प्लान बनाया” नहीं है। असली कहानी यह है कि निकाय चुनाव के नतीजे तय कर सकते हैं कि राजस्थान कांग्रेस की जमीन पर असली संगठनात्मक ताकत किसके पास है और उसी नतीजे के बाद पता चलेगा कि पायलट की सेना के सामने डोटासरा बेअसर हैं या फिलहाल यह सिर्फ राजस्थान कांग्रेस की एक दिलचस्प राजनीतिक थ्योरी है।