राजस्थान निकाय चुनाव: निगमों में वोटिंग शुरू, दिग्गजों की साख दांव पर; जयपुर से जोधपुर तक किसका बजेगा डंका?

राजस्थान निकाय चुनाव के दूसरे चरण में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, पाली और अलवर के छह बड़े नगर निगमों में मतदान हो रहा है। इन शहरों में भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं की राजनीतिक पकड़ और संगठन की ताकत की भी परीक्षा मानी जा रही है।

राजस्थान निकाय चुनाव: निगमों में वोटिंग शुरू, दिग्गजों की साख दांव पर; जयपुर से जोधपुर तक किसका बजेगा डंका?

राजस्थान में निकाय चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग शुरू हो चुकी है और आज छह बड़े नगर निगमों की सियासी परीक्षा हो रही है। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, पाली और अलवर में मतदाता अपने वार्ड के पार्षद चुनने के लिए वोट डाल रहे हैं। मतदान शाम 6 बजे तक चलेगा।

इन छह शहरों का चुनाव इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि यहां मुकाबला सिर्फ स्थानीय मुद्दों और पार्षद की जीत-हार तक सीमित नहीं है। भाजपा और कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की राजनीतिक पकड़ और संगठन की ताकत भी इस चुनाव में परखी जा रही है। यही वजह है कि 11 सितंबर का मतदान 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान की शहरी राजनीति का एक अहम संकेत माना जा रहा है।

जयपुर में सरकार और संगठन दोनों की परीक्षा

राजधानी जयपुर पर सबसे ज्यादा नजरें टिकी हैं। जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज के राजनीतिक समीकरण अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों जगह का परिणाम भाजपा और कांग्रेस के लिए खास महत्व रखता है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का विधानसभा क्षेत्र सांगानेर जयपुर ग्रेटर में आता है, जबकि उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी भी जयपुर से विधायक हैं। ऐसे में भाजपा के लिए राजधानी में मजबूत प्रदर्शन सरकार और संगठन दोनों के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त देगा।

दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने जयपुर में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की चुनौती है। सड़क, सफाई, ट्रैफिक, पानी और ड्रेनेज जैसे स्थानीय मुद्दे मतदाताओं के फैसले में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

जोधपुर में गहलोत-शेखावत फैक्टर

जोधपुर की लड़ाई भी प्रदेश की सियासत में खास वजन रखती है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की लंबे समय से जोधपुर में मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है। वहीं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।

ऐसे में जोधपुर के नगर निगम चुनाव को स्थानीय बोर्ड की लड़ाई से आगे दोनों दलों के प्रभाव की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है। परिणाम यह संकेत दे सकते हैं कि शहर की राजनीति में किसका संगठन और स्थानीय नेटवर्क ज्यादा प्रभावी रहा।

उदयपुर में भाजपा के शहरी गढ़ की परीक्षा

उदयपुर लंबे समय से भाजपा के मजबूत शहरी आधार वाले इलाकों में गिना जाता रहा है। ऐसे में यहां कांग्रेस के लिए बेहतर प्रदर्शन करना बड़ी चुनौती के साथ-साथ राजनीतिक अवसर भी है।

वहीं भाजपा के लिए सवाल यह है कि पुराने मजबूत आधार और स्थानीय संगठन का असर इस चुनाव में कितना कायम रहता है। पूर्व नेता गुलाबचंद कटारिया के राजस्थान की सक्रिय राजनीति से बाहर होने के बाद स्थानीय नेतृत्व की भूमिका भी चर्चा में है।

अजमेर में स्थानीय समीकरणों पर नजर

अजमेर में चुनाव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और विधायक अनिता भदेल जैसे नेताओं का प्रभाव चर्चा में है।

कांग्रेस के लिए अजमेर की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि शहर की राजनीति में सचिन पायलट से जुड़े पुराने राजनीतिक समीकरणों का असर माना जाता रहा है। व्यापारी वर्ग, सरकारी कर्मचारी, सिंधी समाज और अल्पसंख्यक मतदाताओं के समीकरण भी यहां चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

पाली में प्रदेशाध्यक्ष की प्रतिष्ठा

पाली का चुनाव भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के लिए खास महत्व रखता है। पाली उनका गृह जिला है और ऐसे में यहां पार्टी का प्रदर्शन उनके संगठनात्मक प्रभाव से जोड़कर देखा जाएगा।

स्थानीय स्तर पर पानी, सीवरेज, टेक्सटाइल उद्योग और बांडी नदी से जुड़े मुद्दे चुनावी चर्चा में हैं। भाजपा के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

 अलवर में भी बड़े चेहरों की परीक्षा

अलवर में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए मुकाबला महत्वपूर्ण है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ भाजपा विधायक और मंत्री संजय शर्मा की भूमिका पर नजर रहेगी। वहीं कांग्रेस के भंवर जितेंद्र सिंह का स्थानीय प्रभाव भी चुनावी समीकरणों में अहम माना जा रहा है।

अलवर में रोजगार, औद्योगिक विकास, स्थानीय सुविधाएं और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच चर्चा में हैं।

छह शहरों का फैसला, 2028 से पहले बड़ा संकेत?

नगर निकाय चुनाव को सीधे विधानसभा चुनाव का पैमाना मानना सही नहीं होगा। वार्ड स्तर के मुद्दे, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय समीकरण और निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी यहां नतीजे बदल सकती है।

फिर भी छह बड़े नगर निगमों का सामूहिक परिणाम राजस्थान की शहरी राजनीति की दिशा का संकेत जरूर देगा। भाजपा के पक्ष में मजबूत परिणाम आता है तो पार्टी इसे सरकार और संगठन के प्रति शहरी मतदाताओं के भरोसे के तौर पर पेश कर सकती है। वहीं कांग्रेस को बढ़त मिलती है तो उसके लिए यह 2028 से पहले वापसी की संभावनाओं का राजनीतिक संदेश होगा।

फिलहाल फैसला मतदाता के हाथ में है। वोट नगर निगम के पार्षद के लिए पड़ रहा है, लेकिन नजरें इस बात पर हैं कि इस वोट से किस पार्टी और किस बड़े नेता की सियासी साख मजबूत होती है।