जयपुर में अमीन कागजी के ‘बंटोगे तो कटोगे’ बयान से सियासत गरम, मुस्लिम वोटों को लेकर क्या है कांग्रेस की चिंता?

जयपुर निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस विधायक अमीन कागजी के “बंटोगे तो कटोगे” बयान पर सियासी बहस तेज हो गई है। मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों के बंटवारे और एकजुटता को लेकर कागजी ने अपने बयान का मतलब समझाया।

जयपुर में अमीन कागजी के ‘बंटोगे तो कटोगे’ बयान से सियासत गरम, मुस्लिम वोटों को लेकर क्या है कांग्रेस की चिंता?

जयपुर के निकाय चुनाव में मतदान से ठीक पहले एक बयान ने राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। किशनपोल से कांग्रेस विधायक अमीन कागजी ने परकोटे के मुस्लिम बहुल इलाके में चुनावी सभा के दौरान लोगों से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा- “बंटोगे तो कटोगे।” बयान सामने आते ही सवाल उठने लगा कि कांग्रेस विधायक ने मुस्लिम मतदाताओं के बीच इसी नारे का इस्तेमाल क्यों किया और इसके पीछे चुनावी संदेश क्या था?

दरअसल, जयपुर के परकोटे में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका कई वार्डों में अहम मानी जाती है। निकाय चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की नजर इन इलाकों में अपने समर्थक वोट को एकजुट रखने पर है। ऐसे में कागजी का बयान स्थानीय चुनाव से निकलकर व्यापक राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया।

कागजी ने खुद बताया बयान का मतलब

बयान पर सवाल उठने के बाद अमीन कागजी ने इसे एकजुटता की अपील के तौर पर समझाया। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं को यह संदेश देना था कि वे अलग-अलग हिस्सों में बंटने के बजाय एकजुट रहें।

कागजी ने अपने बयान के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चर्चित “बंटोगे तो कटोगे” नारे का भी हवाला दिया। यानी जिस नारे का इस्तेमाल भाजपा के राजनीतिक विमर्श में सुनाई देता रहा है, उसी को कांग्रेस विधायक ने अपने चुनावी संदेश के लिए इस्तेमाल किया।

भाजपा की रणनीति को लेकर क्या बोले कागजी?

अमीन कागजी ने भाजपा के टिकट वितरण को भी अपने बयान से जोड़ते हुए दावा किया कि आमतौर पर भाजपा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट नहीं देती, लेकिन इस बार निकाय चुनाव में मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिए गए हैं।

कागजी के मुताबिक, इसी वजह से उन्हें लगा कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच वोटों के बंटवारे की संभावना को लेकर बात करना जरूरी है। उनका पूरा तर्क मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने और भाजपा की संभावित सेंधमारी को रोकने की चुनावी रणनीति के इर्द-गिर्द रहा।

जयपुर के परकोटे में मुस्लिम वोट क्यों अहम?

जयपुर के पुराने शहर यानी परकोटे के कई इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने वाली मानी जाती है। नगर निकाय चुनाव में एक-एक वार्ड का परिणाम स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करता है और ऐसे में किसी समुदाय के वोट का एकजुट या विभाजित होना उम्मीदवारों की जीत-हार में भूमिका निभा सकता है।

यही कारण है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में उम्मीदवारों के साथ-साथ बड़े नेता भी अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग को साधने में जुटे हैं। कागजी का बयान भी इसी चुनावी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।

स्थानीय चुनाव में मुद्दों से ज्यादा वोट बैंक की चर्चा?

निकाय चुनाव आम तौर पर सड़क, सफाई, सीवरेज, पानी, ट्रैफिक और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं। लेकिन जयपुर में मतदान से पहले सामने आए इस बयान ने बहस को एक अलग दिशा दे दी है।

अब चर्चा इस बात की भी है कि क्या राजनीतिक दल स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ अपने-अपने परंपरागत वोट बैंक को साधने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं? कागजी का बयान इसी बड़े सवाल को सामने लेकर आया है।

भाजपा-कांग्रेस के लिए क्यों अहम है यह चुनाव?

जयपुर नगर निगम चुनाव को दोनों प्रमुख दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा है। भाजपा राजधानी में अपने संगठन और सरकार के प्रभाव को जमीन पर मजबूत साबित करना चाहती है, जबकि कांग्रेस के सामने अपने पुराने प्रभाव वाले इलाकों में पकड़ बनाए रखने की चुनौती है।

ऐसे में मुस्लिम बहुल वार्डों में कांग्रेस का प्रदर्शन और भाजपा की वहां संभावित बढ़त, दोनों ही चुनावी समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

 अब नजर वोटिंग और नतीजों पर

अमीन कागजी का “बंटोगे तो कटोगे” बयान फिलहाल जयपुर के चुनावी प्रचार का चर्चित मुद्दा बन चुका है। कागजी इसे एकजुटता का संदेश बता रहे हैं, जबकि राजनीतिक तौर पर इसका असर कितना होता है, इसका जवाब मतदान और नतीजों के बाद ही मिलेगा।

सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि किस पार्टी को कितने वोट मिले, बल्कि यह भी है कि जयपुर के मुस्लिम बहुल इलाकों में मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार और पार्टी—इनमें से किसे अपनी पसंद का आधार बनाया।