UP Election 2027: अदिति सिंह-रीता बहुगुणा की ‘घर वापसी’ की चर्चा, क्या कांग्रेस बदल पाएगी यूपी का सियासी गणित?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले अदिति सिंह और पूर्व सांसद रीता बहुगुणा जोशी की कांग्रेस में संभावित वापसी को लेकर सियासी चर्चा तेज है। हालांकि दोनों नेताओं की वापसी को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से राजनीतिक दलों के एजेंडे में हैं। इसी बीच कांग्रेस के पुराने चेहरों की संभावित वापसी को लेकर सियासी चर्चा तेज हो गई है। रायबरेली से जुड़ी अदिति सिंह और पूर्व सांसद रीता बहुगुणा जोशी के नाम इस चर्चा के केंद्र में हैं। हालांकि दोनों नेताओं की कांग्रेस में वापसी को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन अटकलों ने यूपी की सियासत में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
अदिति सिंह की वापसी से रायबरेली में क्या बदलेगा?
अदिति सिंह का राजनीतिक आधार रायबरेली सदर सीट से जुड़ा रहा है। उनके पिता अखिलेश सिंह इस सीट से पांच बार विधायक रहे थे। 2017 में अदिति सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था। बाद में उनका कांग्रेस से राजनीतिक रिश्ता टूट गया और उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया।
2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर रायबरेली सदर सीट से जीत दर्ज की। उन्हें 1,02,429 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के राम प्रताप यादव को 95,254 वोट मिले। यानी जीत का अंतर 7,175 वोट रहा।
यही आंकड़ा 2027 की संभावित राजनीति को दिलचस्प बनाता है। अगर अदिति सिंह कांग्रेस में लौटती हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि उनका व्यक्तिगत प्रभाव कितना कांग्रेस के पक्ष में ट्रांसफर हो पाता है।
क्या बीजेपी में कम हुई राजनीतिक भूमिका?
अदिति सिंह की संभावित वापसी की चर्चाओं के बीच उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि बीजेपी में उन्हें अपेक्षित राजनीतिक भूमिका नहीं मिली। हालांकि इस दावे को लेकर पार्टी की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं है।
अगर कांग्रेस उन्हें वापस लाती है तो सिर्फ चुनावी टिकट ही नहीं, बल्कि संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देना भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे कांग्रेस को एक महिला और युवा चेहरे को प्रदेश की राजनीति में आगे बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
राहुल गांधी के रायबरेली कनेक्शन से जुड़ा बड़ा सवाल
2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की रायबरेली से जीत ने कांग्रेस के इस पुराने राजनीतिक क्षेत्र को फिर चर्चा में ला दिया। ऐसे में अदिति सिंह की संभावित वापसी को रायबरेली में कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से भी देखा जा रहा है।
अगर एक ही क्षेत्र में सांसद और विधानसभा स्तर पर कांग्रेस का प्रभाव मजबूत होता है, तो पार्टी के संगठन को स्थानीय स्तर पर इसका फायदा मिल सकता है। हालांकि यह तभी संभव होगा, जब पार्टी अपनी पुरानी पकड़ को वोट में बदलने में सफल रहे।
रीता बहुगुणा जोशी की कहानी अलग
रीता बहुगुणा जोशी का राजनीतिक कद अदिति सिंह से काफी अलग है। वह लंबे समय तक कांग्रेस में सक्रिय रहीं और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा यूपी की राजनीति के बड़े नामों में शामिल रहे हैं।
2016 में रीता बहुगुणा जोशी बीजेपी में शामिल हुई थीं। इसके बाद उन्होंने लखनऊ कैंट से विधानसभा चुनाव जीता और 2019 में प्रयागराज से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया।
अब 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उनकी संभावित राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चाएं फिर तेज हैं।
मयंक जोशी का फैक्टर भी अहम
रीता बहुगुणा जोशी की संभावित वापसी की चर्चा में उनके बेटे मयंक जोशी का नाम भी जुड़ता है। 2022 में उन्होंने बीजेपी से विधानसभा टिकट की दावेदारी की थी, लेकिन टिकट नहीं मिला। चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात की तस्वीर भी सामने आई थी, जिसके बाद उनके सपा में जाने की अटकलें लगी थीं।
हालांकि उन्होंने सपा की सदस्यता नहीं ली। ऐसे में 2027 से पहले रीता बहुगुणा जोशी की राजनीतिक सक्रियता और परिवार की आगे की रणनीति पर भी नजर रहेगी।
कांग्रेस को मिल सकते हैं पुराने नेटवर्क का फायदा
अगर अदिति सिंह और रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस में लौटती हैं तो पार्टी को दो ऐसे चेहरे मिल सकते हैं, जिनका यूपी की राजनीति में अपना अनुभव और नेटवर्क रहा है।
रीता बहुगुणा जोशी के जरिए कांग्रेस को संगठनात्मक अनुभव और ब्राह्मण-सवर्ण संपर्क का फायदा मिलने की संभावना देखी जा सकती है, जबकि अदिति सिंह रायबरेली में महिला और युवा चेहरे के तौर पर पार्टी के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
लेकिन दूसरी तरफ चुनौती भी कम नहीं है। सवाल यही रहेगा कि क्या इन दोनों नेताओं की पुरानी राजनीतिक पकड़ आज भी उतनी प्रभावी है और क्या उनके साथ उनके समर्थक भी कांग्रेस के साथ वापस आएंगे?

