वंदे मातरम्’ पर देश में नई बहस, केंद्र की गाइडलाइन से सियासत गरमाई

देश में एक बार फिर वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज हो गई है।

वंदे मातरम्’ पर देश में नई बहस, केंद्र की गाइडलाइन से सियासत गरमाई

देश में एक बार फिर Vande Mataram राजनीतिक और वैचारिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन, पश्चिम बंगाल में मदरसों और सरकारी स्कूलों में इसके गायन को अनिवार्य किए जाने के फैसले और इसके बाद उठी राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने इस विषय को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

एक तरफ Bharatiya Janata Party और केंद्र सरकार इसे राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रही हैं, वहीं कुछ मुस्लिम संगठन और विपक्षी दल इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के नजरिए से उठा रहे हैं।

केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन में क्या?

Ministry of Home Affairs ने ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों में राष्ट्रगीत की औपचारिक भूमिका स्पष्ट करना है।

गाइडलाइन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन या वादन किया जाएगा।

इसका आधिकारिक पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें कुल छह पद शामिल हैं।

पूरे संस्करण को गाने में लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का समय लगेगा।

यदि किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ और Jana Gana Mana दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले राष्ट्रगीत और उसके बाद राष्ट्रगान होगा।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों से सावधान मुद्रा में खड़े रहने की अपेक्षा की गई है।

स्कूलों और कॉलेजों को सुबह की प्रार्थना सभा में ‘वंदे मातरम्’ को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है।

बैंड प्रस्तुति में बिगुल या ढोल की थाप से इसकी शुरुआत का संकेत देने की अनुशंसा की गई है।

हालांकि, सिनेमा हॉल में फिल्म के हिस्से के रूप में बजने पर लोगों के लिए खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा।

कानून में बदलाव पर भी विचार

केंद्र सरकार Prevention of Insults to National Honour Act 1971 में संशोधन पर भी विचार कर रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करना बताया जा रहा है।

राजनीतिक और धार्मिक प्रतिक्रिया तेज

इस फैसले के बाद कई मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि किसी भी धार्मिक या वैचारिक असहमति रखने वाले व्यक्ति पर राष्ट्रगीत को अनिवार्य करना संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में बहस का विषय है।

वहीं बीजेपी और समर्थक संगठन इसे राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति का प्रतीक बता रहे हैं। उनका तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है और इसे सम्मान देना हर नागरिक का दायित्व होना चाहिए।