कांग्रेस छोड़ेंगे प्रहलाद गुंजल? मंच छोड़ने के बाद बढ़ी चर्चा, क्या नरेश मीणा की राह चलेंगे हाड़ौती के 'लड़ाका नेता'?
कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में अशोक चांदना के नारे लगवाने के दौरान प्रहलाद गुंजल के मंच छोड़कर चले जाने से हाड़ौती की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। क्या कांग्रेस में गुंजल और नेताओं के बीच फिर बढ़ रहा है मनमुटाव? क्या 2028 से पहले वह कोई बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकते हैं? पढ़िए पूरी कहानी।
हाड़ौती की राजनीति में प्रहलाद गुंजल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह कोई चुनावी बयान नहीं, बल्कि कांग्रेस के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सामने आया घटनाक्रम है। कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान अशोक चांदना के मंच से नारे लगवाने के बीच प्रहलाद गुंजल के मंच छोड़कर चले जाने का वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस में प्रहलाद गुंजल और पार्टी के दूसरे नेताओं के बीच एक बार फिर दूरी बढ़ रही है?
गुंजल ने मंच छोड़ा होने लगी चर्चा
कार्यक्रम में अशोक चांदना के संबोधन और नारेबाजी के दौरान प्रहलाद गुंजल के मंच से चले जाने को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। खास बात यह है कि जिस कार्यक्रम में यह घटनाक्रम हुआ, उसकी तैयारियों में गुंजल की भी भूमिका बताई जा रही थी। ऐसे में सार्वजनिक मंच पर उनका चले जाना महज नाराजगी थी या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश है, इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
गुंजल की राजनीति में टकराव का पुराना इतिहास
प्रहलाद गुंजल की राजनीति को देखें तो पार्टी और बड़े नेताओं के साथ टकराव की चर्चा उनके राजनीतिक सफर का हिस्सा रही है। गुर्जर आंदोलन के दौरान बीजेपी से उनका टकराव हुआ और उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी भी बनाई, लेकिन वह प्रयोग ज्यादा सफल नहीं रहा। बाद में गुंजल की बीजेपी में वापसी हुई। बीजेपी में रहते हुए भी कोटा की राजनीति में ओम बिरला के साथ उनके राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं होती रहीं। इसके बाद गुंजल ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। कांग्रेस में आने के बाद भी उनके राजनीतिक रिश्तों को लेकर विवाद खत्म नहीं हुए। कोटा की राजनीति में धारीवाल के साथ उनके समीकरणों को लेकर भी सवाल उठते रहे और अब अशोक चांदना के साथ सामने आए घटनाक्रम ने नई चर्चा को जन्म दिया है।
सवाल - पार्टी के नेताओं के साथ नहीं बने तो चुनाव कैसे जीतेंगे?
प्रहलाद गुंजल की सबसे बड़ी पहचान एक ऐसे नेता की रही है जो जनता के मुद्दों पर आक्रामक तरीके से आवाज उठाते हैं। समर्थक उन्हें हाड़ौती का लड़ाका नेता मानते हैं। लेकिन चुनावी राजनीति सिर्फ आंदोलन और आक्रामक तेवरों से नहीं चलती। इसके लिए संगठन, कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं का समर्थन भी जरूरी होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर गुंजल के पार्टी के अंदर ही बड़े नेताओं से लगातार मतभेद रहते हैं तो 2028 के विधानसभा चुनाव में वह संगठन को अपने पक्ष में कैसे खड़ा करेंगे?
क्या नरेश मीणा की राह पर जाएंगे गुंजल?
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल सामने आता है। क्या प्रहलाद गुंजल कांग्रेस छोड़कर कोई अलग रास्ता चुन सकते हैं? क्या वह अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने का दोबारा प्रयास करेंगे? या फिर वह नरेश मीणा की तरह पार्टी से अलग होकर अपनी सियासी जमीन तलाशेंगे? नरेश मीणा की राजनीति में भी पार्टी नेतृत्व से टकराव के बाद अलग राजनीतिक रास्ते की तस्वीर सामने आई थी। हालांकि अपनी पार्टी या बिना मजबूत संगठन के चुनावी राजनीति करना कितना मुश्किल है, यह भी साफ दिखाई देता है। ऐसे में गुंजल के सामने भी सवाल यही है कि अगर वह कांग्रेस से अलग होते हैं तो उनके पास अगला मजबूत विकल्प क्या होगा?
गुंजल पहले भी लगा चुके हैं बड़ा आरोप
प्रहलाद गुंजल कई मौकों पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के नेता उनके खिलाफ एकजुट हो जाते हैं। उनका कहना रहा है कि जब वह बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस के लोग बीजेपी के साथ आ जाते हैं और जब कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी और कांग्रेस के लोग उन्हें हराने के लिए एकजुट हो जाते हैं। अब सवाल यह है कि अगर गुंजल को बार-बार यही राजनीतिक स्थिति नजर आती है तो क्या वह 2028 से पहले अपना अलग मजबूत राजनीतिक संगठन खड़ा कर पाएंगे?
2028 से पहले ले सकते हैं बड़ा फैसला?
फिलहाल कांग्रेस के कार्यक्रम में मंच छोड़ने की घटना को लेकर राजनीतिक चर्चाएं जरूर तेज हैं, लेकिन इसे गुंजल के कांग्रेस छोड़ने का सीधा संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी। फिर भी हाड़ौती की राजनीति में यह सवाल जरूर खड़ा हो गया है कि आने वाले समय में प्रहलाद गुंजल किस राजनीतिक दिशा में जाएंगे। कांग्रेस में रहकर संगठन के साथ आगे बढ़ेंगे? किसी दूसरी पार्टी का रुख करेंगे? या फिर एक बार फिर अपनी अलग राजनीतिक राह तलाशेंगे? 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रहलाद गुंजल की राजनीतिक दिशा हाड़ौती की सियासत का एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।

