छात्रों की गूंज’ के पीछे राहुल की बड़ी रणनीति? Gen-Z पर फोकस, BJP के लिए नई चुनौती

राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का पांचवां संस्करण इंदौर में हुआ, जहां शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और छात्रों की समस्याओं पर चर्चा हुई। कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे के बाद लगातार कार्यक्रमों ने कांग्रेस की युवा आउटरीच और Gen-Z संवाद को लेकर राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है।

छात्रों की गूंज’ के पीछे राहुल की बड़ी रणनीति? Gen-Z पर फोकस, BJP के लिए नई चुनौती

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम अब सिर्फ छात्रों से संवाद का मंच नहीं रह गया है। इंदौर में शनिवार को इसके पांचवें संस्करण में बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी और ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ जैसे मुद्दों ने इसके बड़े सियासी मायने भी सामने ला दिए हैं। कांग्रेस इसे शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और छात्रों की समस्याओं से जोड़ रही है, लेकिन लगातार अलग-अलग शहरों में कार्यक्रम करने से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी लंबी अवधि के लिए Gen-Z के बीच अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं?

‘छात्रों की गूंज’ का पहला कार्यक्रम कोटा में हुआ था। इसके बाद देहरादून, प्रयागराज और पुणे के बाद अब इंदौर इसका पांचवां पड़ाव बना। अभियान के लगातार विस्तार से संकेत मिलता है कि कांग्रेस छात्र और युवा वर्ग के बीच सीधे संवाद को अपनी राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बना रही है।

राहुल का फोकस आखिर Gen-Z पर क्यों?

देश की युवा आबादी का आकार इस रणनीति को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2026 में देश में 15 से 29 साल की उम्र के करीब 36.74 करोड़ युवा हैं। यह कुल आबादी का करीब 26 फीसदी हिस्सा है। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में 18 से 29 साल के मतदाताओं की हिस्सेदारी 22.78 फीसदी थी। यानी युवा मतदाता चुनावी राजनीति में एक बड़ा समूह हैं।

राहुल गांधी के कार्यक्रमों में भी शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और छात्रों की समस्याओं को लगातार केंद्र में रखा जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इन मुद्दों के जरिए युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है?

इंदौर में भीड़ ने बढ़ाई चर्चा

इंदौर के IDA ग्राउंड में कार्यक्रम के लिए बड़ी संख्या में युवा पहुंचे। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने छात्रों से सीधे संवाद किया। सवाल-जवाब के दौरान उन्होंने कहा कि सिस्टम नहीं चाहता कि छात्र सवाल पूछें और इसी वजह से वह अंधभक्त पैदा करता है।

छात्रों ने भी अपनी समस्याएं राहुल के सामने रखीं। एक छात्रा ने शिक्षा, स्कॉलरशिप और शिक्षा बजट से जुड़े मुद्दे उठाए। इससे साफ है कि कार्यक्रम में राजनीतिक भाषण के साथ-साथ छात्रों की रोजमर्रा की समस्याओं को भी केंद्र में रखा जा रहा है।

क्या 2029 के लिए अभी से Gen-Z कनेक्ट?

युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए 2029 की राजनीति में Gen-Z और युवा वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में राहुल गांधी का लगातार छात्रों के बीच जाना महज संवाद कार्यक्रम है या इसके पीछे लंबी राजनीतिक रणनीति भी है—यह सवाल अब चर्चा में है।

एक तरफ राहुल गांधी शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर छात्रों के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि इन कार्यक्रमों को स्थायी संगठनात्मक और राजनीतिक जुड़ाव में कैसे बदला जाए।

BJP के लिए इससे क्या चुनौती?

अगर शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक और स्कॉलरशिप जैसे मुद्दे युवाओं के बीच लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बनते हैं, तो BJP समेत सभी दलों के सामने युवाओं के बीच अपनी नीतियां और उपलब्धियां सामने रखने की चुनौती होगी।

हालांकि सिर्फ किसी कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ को सीधे चुनावी समर्थन या वोट में बदलकर देखना जल्दबाजी होगी। भीड़, सोशल मीडिया चर्चा और चुनावी वोटिंग व्यवहार के बीच कई स्तर होते हैं। लेकिन राहुल गांधी अगर ‘छात्रों की गूंज’ को लगातार राज्यों और जिलों तक ले जाते हैं, तो यह कांग्रेस की युवा आउटरीच रणनीति को एक अलग दिशा दे सकता है।

अब असली सवाल यही है—क्या ‘छात्रों की गूंज’ कुछ शहरों तक सीमित रहने वाला अभियान है या राहुल गांधी इसे Gen-Z के साथ लंबे राजनीतिक संवाद में बदलने की तैयारी कर रहे हैं?

और अगर यह अभियान लगातार बढ़ता है, तो 2029 की राजनीति में युवा मतदाताओं को लेकर BJP और कांग्रेस के बीच मुकाबला सिर्फ चुनावी मंचों पर नहीं, बल्कि कॉलेज कैंपस और छात्रों के मुद्दों के बीच भी दिखाई दे सकता है।