क्या छात्रों की आवाज़ अनशन के बिना नहीं सुनी जाती? शुभम रेवाड़ का आंदोलन बना बड़ा सवाल

इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों ने कई बार शिक्षा व्यवस्था और नीतियों में बदलाव की दिशा दिखाई है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब किसी आंदोलन की कीमत किसी छात्र की सेहत या जीवन बनने लगे।

क्या छात्रों की आवाज़ अनशन के बिना नहीं सुनी जाती? शुभम रेवाड़ का आंदोलन बना बड़ा सवाल

राजस्थान विश्वविद्यालय (RU) के छात्र नेता शुभम रेवाड़ की भूख हड़ताल अब सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं रह गई है। अनशन के 12वें दिन उनकी हालत गंभीर हो चुकी है। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उन्हें जयपुर पुलिस और प्रशासन ने धरना स्थल से सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया, लेकिन अस्पताल के बेड से भी उन्होंने अपना अनशन समाप्त करने से इनकार कर दिया है।

डॉक्टरों के अनुसार उनके शरीर में कीटोन का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है, जिससे किडनी समेत अन्य अंगों के प्रभावित होने का खतरा है। मेडिकल टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है। सवाल यह नहीं है कि उनकी मांगें सही हैं या गलत। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक छात्र को अपनी बात मनवाने के लिए अपनी जान दांव पर लगाने की नौबत क्यों आती है?

क्या संवाद के रास्ते इतने कठिन हो गए हैं?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद मानी जाती है। विश्वविद्यालयों को विचार-विमर्श और बहस की जगह कहा जाता है, जहां मतभेदों का समाधान बातचीत से निकलता है। लेकिन जब कोई छात्र नेता 12 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठा रहता है और उसकी तबीयत आईसीयू तक पहुंच जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संबंधित अधिकारियों ने समय रहते बातचीत की गंभीर कोशिश की?

क्या विश्वविद्यालय प्रशासन, उच्च शिक्षा विभाग और सरकार के बीच ऐसा कोई संवाद नहीं हो सकता था, जिससे स्थिति यहां तक पहुंचने से पहले ही समाधान निकल जाता? क्या छात्रों की आवाज़ तभी सुनी जाती है, जब आंदोलन जीवन के लिए खतरा बन जाए?

आखिर क्या हैं शुभम रेवाड़ की मांगें?

शुभम रेवाड़ का आंदोलन दो प्रमुख मांगों पर केंद्रित है।

पहली मांग है कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में पिछले तीन वर्षों से रुके हुए छात्रसंघ चुनावों को दोबारा शुरू किया जाए। छात्र संगठनों का तर्क है कि छात्रसंघ चुनाव विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम हैं और इनके बंद रहने से छात्रों की प्रतिनिधित्व व्यवस्था कमजोर हुई है।

दूसरी मांग राजस्थान विश्वविद्यालय में अलग से राजस्थानी भाषा केंद्र और विभाग की स्थापना की है, ताकि छात्र अपनी मातृभाषा में पोस्ट-ग्रेजुएशन और शोध कर सकें। समर्थकों का कहना है कि यह भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है।

इन मांगों से सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन क्या इन पर चर्चा और वार्ता भी नहीं हो सकती?

आंदोलन से बड़ा बनता जा रहा है सवाल

शुभम रेवाड़ की तबीयत लगातार बिगड़ने के साथ यह आंदोलन अब सिर्फ राजस्थान विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा। प्रदेश के कई जिलों में छात्रों ने ज्ञापन देकर समर्थन जताया है। विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की है।

समर्थकों का आरोप है कि आंदोलन को संवाद के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं प्रशासन और सरकार की ओर से कानून-व्यवस्था और स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संवाद की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।

लोकतंत्र में समाधान टकराव नहीं, संवाद से निकलता है

इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों ने कई बार शिक्षा व्यवस्था और नीतियों में बदलाव की दिशा दिखाई है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब किसी आंदोलन की कीमत किसी छात्र की सेहत या जीवन बनने लगे, तो यह पूरे तंत्र के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति का समाधान बातचीत से निकालना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। यदि समय रहते संवाद की पहल हो, तो शायद किसी छात्र को अपनी मांगों के लिए भूख हड़ताल जैसे कठोर कदम उठाने की जरूरत ही न पड़े।

अब सबकी निगाहें अगले कदम पर

फिलहाल शुभम रेवाड़ अस्पताल में भर्ती हैं और उनका अनशन जारी है। डॉक्टर लगातार स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए हैं। दूसरी ओर छात्र आंदोलन का समर्थन भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित अधिकारी और सरकार बातचीत की पहल करेंगे? क्या छात्रों की मांगों पर कोई ठोस रास्ता निकलेगा? या फिर हालात और गंभीर होने के बाद ही समाधान की कोशिश होगी?

इन सवालों का जवाब सिर्फ इस आंदोलन का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था छात्रों की आवाज़ को किस तरह सुनती और समझती है।