निकाय चुनाव में निकली हनुमान बेनीवाल की हवा? 14 से 63 सीटों पर पहुंची RLP, फिर भी सत्ता से दूर क्यों!

राजस्थान निकाय चुनाव में हनुमान बेनीवाल की RLP ने 63 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि पिछले चुनाव में पार्टी करीब 14 वार्डों तक सीमित थी। BJP-कांग्रेस से काफी पीछे रहने के बावजूद RLP का शहरी विस्तार संगठन के लिए नई चुनौती और अवसर दोनों लेकर आया है।

निकाय चुनाव में निकली हनुमान बेनीवाल की हवा? 14 से 63 सीटों पर पहुंची RLP, फिर भी सत्ता से दूर क्यों!

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों को सिर्फ एक सवाल से देखा जाए। हनुमान बेनीवाल की RLP कितने नगर निगम, नगर परिषद या नगरपालिका में सत्ता तक पहुंची तो तस्वीर बहुत प्रभावशाली दिखाई नहीं देती। लेकिन आंकड़ों की दूसरी परत खोलते ही कहानी बदल जाती है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने इस बार 63 वार्ड जीते हैं। पिछली निकाय चुनावी तस्वीर में पार्टी करीब 14 वार्डों पर थी। यानी सीटों की संख्या लगभग साढ़े चार गुना हुई है। इसके बावजूद सवाल कायम है। इतनी तेजी से विस्तार के बाद भी RLP राजस्थान की शहरी सत्ता में बड़ी ताकत क्यों नहीं बन पाई?

4,179 BJP, 3,613 कांग्रेस और RLP सिर्फ 63

सबसे पहले बड़ी तस्वीर देखनी होगी। राजस्थान के घोषित निकाय नतीजों में BJP ने 4,179, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते। RLP के खाते में 63 सीटें आईं। इन आंकड़ों के सामने बेनीवाल की पार्टी की मौजूदगी सीमित नजर आती है। यानी RLP ने विस्तार जरूर किया है, लेकिन अभी वह BJP-कांग्रेस के शहरी संगठन के आसपास भी नहीं पहुंची है।

बेनीवाल की लोकप्रियता और RLP के संगठन में अंतर

हनुमान बेनीवाल की राजनीतिक ताकत का बड़ा हिस्सा ग्रामीण राजस्थान और कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित रहा है। स्थानीय निकाय चुनाव का चरित्र इससे अलग है। नगरपालिका चुनाव में प्रदेश स्तर पर लोकप्रिय नेता होने के साथ हर वार्ड में मजबूत प्रत्याशी, बूथ स्तर का नेटवर्क और स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय संगठन की जरूरत होती है। यही वह क्षेत्र है जहां BJP और कांग्रेस को अपने पुराने संगठन का फायदा मिलता है। बेनीवाल किसी इलाके में लोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन उस लोकप्रियता को दर्जनों अलग-अलग वार्डों में जीत में बदलने के लिए RLP को स्थानीय नेतृत्व की लंबी चेन चाहिए।

63 पार्षद ही बन सकते हैं नया संगठन

लेकिन यही चुनाव RLP को एक अवसर भी देकर गया है। जीते हुए 63 पार्षद अगर अगले कुछ वर्षों तक अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं तो वे पार्टी के लिए भविष्य का संगठनात्मक ढांचा तैयार कर सकते हैं। पार्षद के साथ कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनता है। बूथ स्तर पर नए चेहरे सामने आते हैं। स्थानीय मुद्दों पर पार्टी की मौजूदगी बढ़ती है और यही नेटवर्क बाद में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में काम आता है। इस लिहाज से 63 का आंकड़ा सिर्फ चुनावी परिणाम नहीं बल्कि RLP के लिए संभावित संगठनात्मक पूंजी भी है।

बेनीवाल के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी चुनौती

नतीजों ने यह भी दिखाया कि बेनीवाल की व्यक्तिगत लोकप्रियता हर जगह स्थानीय निकाय की सीट में स्वतः नहीं बदलती। डीडवाना नगर परिषद इसका उदाहरण है। यहां कांग्रेस ने 16 वार्ड जीते, निर्दलीयों को 14 और BJP को 9 सीटें मिलीं, जबकि RLP एक वार्ड जीत सकी। इससे स्थानीय निकाय की राजनीति का एक महत्वपूर्ण फर्क सामने आता है। लोकसभा स्तर का प्रभाव और वार्ड स्तर का संगठन एक ही चीज नहीं हैं

तो हवा निकली या जमीन बढ़ी?

इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि पैमाना क्या रखा जाए। अगर RLP की तुलना BJP और कांग्रेस से की जाए तो बेनीवाल की पार्टी अभी राजस्थान की शहरी सत्ता से काफी दूर है। लेकिन अगर RLP के अपने पिछले प्रदर्शन से तुलना करें तो 14 से 63 वार्ड तक पहुंचना स्पष्ट विस्तार है। इसलिए इन नतीजों को न तो बेनीवाल की बड़ी विजय कहा जा सकता है और न उनकी राजनीति के खत्म होने का संकेत। असल कहानी अब शुरू होती है। क्या RLP इन 63 पार्षदों को स्थायी शहरी संगठन में बदल पाएगी? क्या हारे हुए वार्डों में अगले चुनाव से पहले नेटवर्क खड़ा होगा? और क्या बेनीवाल की ग्रामीण लोकप्रियता धीरे-धीरे शहरों में भी सीटों में बदल पाएगी? क्योंकि इस चुनाव ने एक बात साफ कर दी है। बेनीवाल की राजनीतिक हवा शहरों तक पहुंची जरूर है, लेकिन उसे सत्ता की ताकत में बदलने के लिए RLP को अब जमीन पर संगठन खड़ा करना होगा। 63 पार्षद उस यात्रा की मंजिल भी हो सकते हैं... और शुरुआत भी।