‘10 दिन तक नहीं आता पानी’, कुम्हारिया बॉस के ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, वोट मांगने आते हैं, विकास का हिसाब कौन देगा?

कुम्हारिया बॉस ग्राम पंचायत की PK Times ग्राउंड रिपोर्ट में ग्रामीणों ने पेयजल, जलभराव, नालियों, खेल मैदान और शिक्षा की समस्याएं उठाईं और सरपंच उम्मीदवारों से लिखित घोषणा पत्र की मांग की।

‘10 दिन तक नहीं आता पानी’, कुम्हारिया बॉस के ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, वोट मांगने आते हैं, विकास का हिसाब कौन देगा?

चुनाव आते हैं, सरपंच पद के उम्मीदवार गांव की गलियों में पहुंचते हैं, विकास के वादे करते हैं और मतदाताओं से समर्थन मांगते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद क्या ग्रामीणों की समस्याएं भी खत्म होती हैं? कुम्हारिया बॉस ग्राम पंचायत में PK Times की ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान इस सवाल का जवाब ग्रामीणों की शिकायतों में मिला। किसी ने कहा कि गांव में पीने का पानी नियमित नहीं आता। किसी ने बताया कि गलियों में गंदा पानी जमा रहता है। बुजुर्गों ने खेल मैदान और नालियों की समस्या उठाई, तो युवाओं ने सरपंच पद के उम्मीदवारों से लिखित घोषणा पत्र की मांग कर दी। लेकिन इस बातचीत में सबसे ज्यादा चर्चा पेयजल संकट की हुई। एक ग्रामीण ने बताया कि कभी दो दिन, कभी पांच दिन और कभी-कभी दस दिन तक पानी की आपूर्ति नहीं होती। जब पानी आता भी है, तो कई घरों में केवल 10 से 15 मिनट ही सप्लाई मिलती है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब हर चुनाव में पानी की समस्या दूर करने के वादे किए जाते हैं, तो आज भी उन्हें पानी के टैंकर क्यों मंगवाने पड़ रहे हैं?

‘पानी कब आएगा, इसका कोई समय तय नहीं’

गांव के बुजुर्गों ने पेयजल आपूर्ति को लेकर नाराजगी जताई। एक ग्रामीण ने बताया कि पहले एक दिन छोड़कर पानी की आपूर्ति होती थी, लेकिन अब इसकी कोई निश्चित व्यवस्था नहीं है। उनके अनुसार, कभी दो दिन बाद पानी आता है, कभी तीन या पांच दिन बाद और कई बार दस दिन तक इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीण ने कहा, ‘किसी को 10 मिनट पानी मिलता है, किसी को 15 मिनट। पानी आने का न कोई दिन तय है और न ही समय।’ उन्होंने आरोप लगाया कि पानी की आपूर्ति संबंधित कर्मचारियों की मर्जी पर निर्भर हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अनियमित सप्लाई के कारण उन्हें घरेलू जरूरतों के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने पड़ते हैं। कुछ परिवारों को पानी के टैंकर मंगवाने पड़ते हैं, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।

बीसलपुर का पानी नहीं मिलने की शिकायत, पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल

ग्राउंड रिपोर्ट में कुछ ग्रामीणों ने बीसलपुर परियोजना के पानी की आपूर्ति को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि अपेक्षा के अनुसार बीसलपुर का पानी नहीं मिल रहा है। एक ग्रामीण ने आरोप लगाया कि उन्हें कुएं या अन्य स्रोत का ऐसा पानी दिया जा रहा है, जिसकी गुणवत्ता को लेकर चिंता है। बातचीत में पानी में फ्लोराइड की आशंका भी जताई गई। हालांकि, पानी में फ्लोराइड की वास्तविक मात्रा या उसकी गुणवत्ता के संबंध में कोई जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। ऐसे में ग्रामीणों की इस शिकायत की पुष्टि के लिए संबंधित जलापूर्ति विभाग से पानी की जांच और आपूर्ति व्यवस्था का विवरण आवश्यक होगा। ग्रामीणों ने मांग की कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाए।

गलियों में भरा रहता है गंदा पानी, नालियों का काम अधूरा

पेयजल के साथ-साथ गांव में जल निकासी की समस्या भी प्रमुखता से सामने आई। एक ग्रामीण ने बताया कि कई स्थानों पर नालियों का काम अधूरा है, जिसके कारण गंदा पानी बाहर नहीं निकल पाता।

उन्होंने कहा कि गलियों में पानी जमा रहने से लोगों को परेशानी होती है। ग्रामीणों ने मांग की कि पंचायत में व्यवस्थित ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जाए। उनका कहना था कि सिर्फ सड़क बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक पानी की निकासी का उचित इंतजाम नहीं किया जाएगा, तब तक गलियों में जलभराव की परेशानी बनी रहेगी।

‘वोट की बात होती है, महिला सशक्तिकरण की नहीं’

ग्रामीणों से बातचीत में महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे भी सामने आए। एक युवक ने कहा कि चुनाव के दौरान उम्मीदवार वोट और राजनीतिक समीकरणों की चर्चा करते हैं, लेकिन महिलाओं के विकास और उनकी जरूरतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उसने सवाल उठाया कि जब ग्रीन विलेज और महिला सशक्तिकरण की बातें की जाती हैं, तो इनके लिए ठोस योजनाएं क्यों नहीं बनाई जातीं? ग्रामीण ने शिक्षा, पुस्तकालय, सीसीटीवी कैमरे और सड़कों पर पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था को भी जरूरी बताया। उसके अनुसार, सार्वजनिक स्थानों पर बेहतर रोशनी और सुरक्षा संबंधी सुविधाएं महिलाओं तथा बालिकाओं के लिए उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि, बातचीत में शामिल एक बुजुर्ग ने कहा कि उनके गांव में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उन्हें कोई विशेष समस्या महसूस नहीं होती। इस तरह ग्रामीणों की प्राथमिकताओं में महिला सुरक्षा को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण भी सामने आए।

‘सरपंच उम्मीदवार लिखित घोषणा पत्र लेकर आएं’

इस ग्राउंड रिपोर्ट में एक ग्रामीण ने पंचायत चुनाव की राजनीति पर महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उसने कहा कि सरपंच पद के उम्मीदवार जनता के बीच आते हैं, लेकिन विकास कार्यों का लिखित घोषणा पत्र प्रस्तुत नहीं करते। ग्रामीण के अनुसार, चुनाव में जातीय समीकरण और राजनीतिक समर्थन की चर्चा अधिक होती है, जबकि स्थानीय समस्याओं के समाधान का स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं रखा जाता। उसने कहा, ‘हम चाहते हैं कि उम्मीदवार घोषणा पत्र के साथ आएं और बताएं कि कौन-सा काम किस तरह करेंगे।’ ग्रामीण ने मांग की कि उम्मीदवार अपनी योजनाएं चरणबद्ध तरीके से समझाएं, ताकि जनता यह जान सके कि चुनाव जीतने के बाद उनकी प्राथमिकताएं क्या होंगी। उसका कहना था कि केवल मौखिक वादों के बजाय लिखित योजना से उम्मीदवारों की जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है।

पिछले सरपंच के कामकाज पर ग्रामीणों की अलग-अलग राय

पिछले पंचायत कार्यकाल को लेकर भी ग्रामीणों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। एक ग्रामीण ने कहा कि पूर्व सरपंच ने काम करने का प्रयास किया और कुछ क्षेत्रों में विकास हुआ, लेकिन सभी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं। उसने पिछले कार्यकाल को औसत बताते हुए कहा कि लगभग आधी उम्मीदें पूरी हुईं और आधी अधूरी रह गईं। वहीं, एक अन्य बुजुर्ग ने पिछले कार्यकाल के विकास कार्यों पर असंतोष जताया। उन्होंने दावा किया कि पंचायत में पर्याप्त विकास नहीं हुआ और कई समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। कुछ ग्रामीणों ने पंचायतों को मिलने वाले बजट की कमी को भी विकास कार्यों में बाधा बताया। हालांकि, पिछले कार्यकाल में पंचायत को कितना बजट मिला, कितने विकास कार्य स्वीकृत हुए और कितना खर्च हुआ, इसकी आधिकारिक जानकारी इस बातचीत में उपलब्ध नहीं थी।

‘बजट कम मिलेगा तो विकास कैसे होगा?’

एक बुजुर्ग ग्रामीण ने पंचायतों के विकास में बजट की भूमिका पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि सरकार की ओर से पर्याप्त धनराशि नहीं मिलने पर सड़क, बिजली और अन्य सुविधाओं का विकास प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि विकास कार्यों के लिए बजट जरूरी है और इसके बिना सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। हालांकि, पंचायतों को अलग-अलग योजनाओं और मदों से वित्तीय सहायता मिलती है। किसी विशेष पंचायत में धन की कमी रही या उपलब्ध राशि का उपयोग नहीं हुआ, यह आधिकारिक वित्तीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।

खेल मैदान नहीं, बच्चों के लिए सुविधाओं की मांग

ग्रामीणों ने बच्चों और युवाओं के लिए खेल सुविधाओं की कमी का मुद्दा भी उठाया। एक ग्रामीण ने बताया कि गांव में स्कूल तो है, लेकिन खेल गतिविधियों के लिए पर्याप्त विकसित मैदान और जरूरी संसाधन नहीं हैं। उन्होंने कहा कि क्रिकेट, वॉलीबॉल और दूसरे खेलों के लिए बुनियादी ढांचा विकसित किया जाना चाहिए। ग्रामीणों की मांग थी कि पंचायत स्तर पर ऐसा खेल मैदान बनाया जाए, जहां बच्चे और युवा नियमित रूप से अभ्यास कर सकें। इसके अलावा युवाओं के लिए पुस्तकालय और शिक्षा संबंधी सुविधाओं को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई।

सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा, लेकिन सुविधाओं में सुधार की जरूरत

ग्राउंड रिपोर्ट में ग्रामीणों से सरकारी योजनाओं की पहुंच को लेकर भी सवाल किए गए। कुछ बुजुर्गों ने बताया कि उन्हें वृद्धावस्था पेंशन और पात्रता के अनुसार राशन जैसी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में ग्रामीणों ने बताया कि आसपास के क्षेत्र और वाटिका में स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध हैं। हालांकि, उन्होंने शिक्षा और नियमित पेयजल आपूर्ति को गांव की सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल किया। एक ग्रामीण ने कहा कि रोजगार की समस्या भी महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थानीय स्तर पर सरपंच के अधिकार और संसाधन सीमित होते हैं। बातचीत में मनरेगा का भी उल्लेख हुआ। उल्लेखनीय है कि मनरेगा के कार्यों की योजना और क्रियान्वयन में ग्राम पंचायत की वैधानिक भूमिका होती है, हालांकि रोजगार उपलब्ध कराने और भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित सरकारी नियमों के अधीन संचालित होती है।

क्या इस बार बदलेंगे पंचायत चुनाव के मुद्दे?

कुम्हारिया बॉस की इस ग्राउंड रिपोर्ट में किसी एक उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष से अधिक ग्रामीणों की रोजमर्रा की समस्याएं सामने आईं। ग्रामीणों ने स्वच्छ पेयजल, जल निकासी, सड़क, शिक्षा, खेल मैदान और सार्वजनिक सुविधाओं को अपनी प्राथमिकताओं में रखा। सबसे महत्वपूर्ण मांग यह रही कि सरपंच पद के उम्मीदवार केवल चुनावी वादे न करें, बल्कि अपने विकास कार्यों का लिखित घोषणा पत्र भी जनता के सामने रखें। इससे मतदाता समझ सकेंगे कि उम्मीदवार किन कामों को प्राथमिकता देंगे और उनके लिए क्या योजना है।

चुनाव के बाद भी पूछा जाएगा सवाल - पानी कब मिलेगा?

कुम्हारिया बॉस में ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता फिलहाल पेयजल आपूर्ति दिखाई दी। किसी को 10 मिनट पानी मिलता है, तो किसी को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसी शिकायतें बातचीत में बार-बार सामने आईं। इसके अलावा जलभराव, नालियों और खेल सुविधाओं की समस्याओं ने भी ग्रामीण विकास की वास्तविक चुनौतियों को उजागर किया। चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसका फैसला मतदाता करेंगे। लेकिन कुम्हारिया बॉस के ग्रामीणों ने एक बात स्पष्ट कर दी है। उन्हें सिर्फ चुनावी भाषण नहीं, नियमित पानी और बुनियादी सुविधाओं का समाधान चाहिए। अब देखने वाली बात होगी कि सरपंच पद के दावेदार इन मुद्दों पर क्या ठोस योजनाएं प्रस्तुत करते हैं और चुनाव के बाद ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।