राज्यपाल ने लौटाए 10 विधेयक, 9 गहलोत सरकार के, मॉब लिंचिंग बिल भी वापस विधानसभा पहुंचा

राजस्थान में वर्षों से लंबित पड़े 10 विधेयक एक बार फिर विधानसभा के पाले में आ गए हैं। राज्यपाल ने इन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस लौटा दिया है।

राज्यपाल ने लौटाए 10 विधेयक, 9 गहलोत सरकार के, मॉब लिंचिंग बिल भी वापस विधानसभा पहुंचा

राजस्थान के राज्यपाल ने लंबे समय से लंबित 10 विधेयकों को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटा दिया है। इनमें 9 विधेयक पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल के हैं, जबकि एक विधेयक वसुंधरा राजे सरकार के समय का है। मॉब लिंचिंग से संरक्षण से जुड़ा विधेयक भी वापस भेजे गए बिलों में शामिल है। 

राजस्थान में वर्षों से लंबित पड़े 10 विधेयक एक बार फिर विधानसभा के पाले में आ गए हैं। राज्यपाल ने इन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस लौटा दिया है। इन 10 विधेयकों में से 9 पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल के हैं, जबकि एक विधेयक वसुंधरा राजे सरकार के समय का है। वापस लौटाए गए विधेयकों में सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक, 2019 की हो रही है। यह विधेयक मॉब लिंचिंग की घटनाओं से निपटने के उद्देश्य से गहलोत सरकार के दौरान विधानसभा से पारित किया गया था। अब राज्यपाल द्वारा विधेयकों को पुनर्विचार के लिए लौटाए जाने के बाद विधानसभा को इन पर दोबारा विचार करना होगा।

9 विधेयक गहलोत सरकार के कार्यकाल के

इस फैसले का राजनीतिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। लौटाए गए दस विधेयकों में नौ ऐसे हैं जो अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में विधानसभा से पारित किए गए थे। वहीं राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2008 वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल से संबंधित है। यानी राजस्थान में सरकारें बदल गईं, विधानसभा के कार्यकाल बदल गए, लेकिन इनमें से कुछ विधेयक वर्षों तक अंतिम मंजूरी का इंतजार करते रहे।

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मॉब लिंचिंग बिल फिर चर्चा में

इन विधेयकों में सबसे राजनीतिक रूप से चर्चित राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक, 2019 रहा है। गहलोत सरकार ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने और उनसे जुड़े मामलों के लिए कानूनी व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से इसे विधानसभा में पारित कराया था। अब इस विधेयक को भी पुनर्विचार के लिए विधानसभा में वापस भेज दिया गया है। इसके बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मौजूदा भाजपा सरकार इस विधेयक को लेकर क्या रुख अपनाती है। 

2008 का धर्म स्वातंत्र्य विधेयक भी लौटा

सूची में सबसे पुराना विधेयक राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2008 है। यह वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली तत्कालीन भाजपा सरकार के समय का है। इतने लंबे समय बाद इसे भी विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए भेजा गया है। इस तरह एक तरफ गहलोत सरकार के नौ विधेयक हैं तो दूसरी तरफ भाजपा की पूर्ववर्ती राजे सरकार के दौर का करीब दो दशक पुराना विधेयक भी इस सूची में शामिल है।

अब भजनलाल सरकार के सामने बड़ा फैसला

राज्यपाल द्वारा विधेयक लौटाए जाने के बाद मामला केवल प्रक्रियागत नहीं रह गया है। अब मौजूदा भजनलाल शर्मा सरकार और विधानसभा को तय करना होगा कि इन विधेयकों के साथ आगे क्या किया जाए। खास तौर पर मॉब लिंचिंग, कृषि कानूनों से जुड़े राज्य संशोधन और धर्म स्वातंत्र्य जैसे विषय राजनीतिक और वैचारिक रूप से संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में इन पर विधानसभा में दोबारा विचार होने की स्थिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस देखने को मिल सकती है।

वर्षों पुरानी फाइलें फिर खुलीं

इन 10 विधेयकों की वापसी ने राजस्थान की राजनीति की कई पुरानी फाइलें एक साथ खोल दी हैं। एक विधेयक 2008 का है, कई 2019 और 2020 के हैं, जबकि कुछ 2022 और 2023 में पारित हुए थे। इसलिए सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि राज्यपाल ने 10 विधेयक क्यों लौटाए। बड़ा सवाल यह है कि क्या भजनलाल सरकार पिछली गहलोत सरकार के इन विधेयकों को बदलाव के साथ आगे बढ़ाएगी, दोबारा पारित करने की दिशा में जाएगी या इनके स्थान पर अपनी सरकार की नीतियों के अनुरूप नया कानूनी रास्ता चुनेगी? इसका जवाब आने वाली विधानसभा कार्यवाही में मिल सकता है।

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